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________________ जीव-विज्ञान कर्मयोग होता है। यह जो शरीर है जिसे भौतिक शरीर कहते हैं यह तो यही पर छूट जाएगा और आत्मा के साथ जो जुड़ा है उस शरीर का नाम कार्मण शरीर होता है। वह आपके साथ उस बीच की स्थिति में भी रहेगा और जब तक आप उस स्थान पर नहीं पहुँच जाओगे जहाँ पर आपका जन्म होना है तब तक आपकी आत्मा के साथ जो रहेगा उसे ही कर्मयोग कहते हैं। कई लोग कहते हैं-कर्मयोगी बनो। यहाँ उनके लिए यही कहने में आ जाता है कर्म करो और फल की इच्छा मत करो, वही आपके लिए सबसे बड़ा योग है। सच्चे कर्मयोगी वही कहलाते हैं जो कर्म तो करते हैं लेकिन फल की इच्छा नहीं करते हैं। यहाँ पर जो आपके लिए कर्मयोग बताया जा रहा है वह यह बताया जा रहा है जो आपने कर्म किया है वह आपके साथ बंध गया है वही कर्म आपको आगे फल देगा। सही रूप में तो आप कर्मयोगी तब कहलाएंगे जब आप इस शरीर से भी अपना ममत्व छोड़ देंगे। यहाँ पर उसी की एक बात कही जाती है कि यहाँ पर आप कर्मयोगी कैसे हो सकते हैं? यहाँ पर भी आपको कर्म करते हुए उन कर्मों के फलों की इच्छा नहीं करना है, उन कर्मों में अपना ममत्व नहीं रखना है यही आपको यहाँ पर कर्मयोगी बनाएगा। वास्तव में आप कर्मयोगी कब बनेंगे? आचार्य कहते हैं-'जिस समय आप विग्रहगति में होंगे उस समय केवल कर्म ही होगा और कुछ नहीं होगा। ये जो कर्म हैं जो आत्मा से बंधे हुए हैं वही कर्म हमारे साथ रहते हैं और उनके माध्यम से आत्मा के प्रदेशों में भी स्पन्दन होता है। उन आत्मा के प्रदेशों में जो स्पन्दन हो रहा है उसी का नाम 'योग' है। वह स्पन्दन किसके कारण से हो रहा है?विग्रह गति में यह केवल कर्मों के कारण से होता है इसलिए इसका नाम कार्मणकाययोग या कर्मयोग कहलाता है। यह कर्मयोग कहाँ होगा?यह कर्मयोग केवल विग्रहगति में होगा। यहाँ पर जो आपका इस शरीर के साथ योग होगा वह मन-वचन-काय का योग कहलाएगा। इस योग के साथ में ये कर्म बंधेगे। जब यह योग छूट जाएगा तो विग्रहगति में आपके साथ केवल कर्मयोग रह जाएगा। उस कर्मयोग में क्या होता है? तो आचार्य कहते हैं-"उस कर्मयोग में केवल कर्म वर्गणाओं का ही ग्रहण होता है। शरीर के योग्य पुद्गलों का ग्रहण नहीं करना, कर्म पुदगलों को ही केवल ग्रहण करना। जिससे शरीर बनता है उन पुद्गलों का ग्रहण विग्रहगति में नहीं होगा। उनका ग्रहण तो आपका जिस गति में जन्म होगा उस गति में होगा। बीच की उस स्थिति में केवल कर्मों का ग्रहण होता है। इसलिए इसको विग्रहगति कहा जाता है। विग्रह का अर्थ-शरीर भी होता है। एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को ग्रहण करने के लिए बीच में जो गति होती है उसको विग्रह कहते हैं। इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलकर आता है। तो यह गति किस रूप में होती है? जैसे- किसी जीव को जन्म लेना है। एक कोने से दूसरे कोने में जन्म लेना है। लोक के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना है। तो क्या वह सीधे ही एक कोने से दूसरे कोने तक चला जाएगा या उसकी कोई विधि है? आगे के सूत्र में आचार्य जीव का गमन किस प्रकार होता है? उसकी विधि बता रहे हैं 55
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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