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________________ जीव-विज्ञान अर्थ-विग्रहगति में कार्मण काययोग होता है। उसी की सहायता से जीव एक गति से दूसरी गति में गमन करता है। एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर की प्राप्ति के लिए गमन करना विग्रहगति है। कार्मण शरीर के द्वारा जो आत्मा के प्रदेशों में कम्पन होता है उसको कर्मयोग कहते हैं। जो बीच की गति होती है उसे विग्रहगति कहते हैं। अर्थात् जब तक मनुष्य या कोई अन्य जीव मरकर दूसरी गति को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक उसके बीच की गति को विग्रहगति कहते हैं। आपने पहले चार गतियाँ पढ़ी हैं, वह तो गतियाँ हैं ही। लेकिन जो यह बीच की गति है उसे विग्रहगति कहते हैं। उस विग्रहगति में अपने पास क्या होता है? आचार्य कहते हैं वहाँ पर केवल कर्मयोग है। एक योग छठवें अध्याय में आता है-“कायवाङ् मनः कर्मयोगः” और इसमें में यही शब्द लिखा हुआ है 'कर्मयोगः और यहाँ पर भी लिखा हुआ है कर्मयोगः। लेकिन वहाँ जो कर्मयोग लिखा हुआ है उसके साथ में कुछ और भी लिखा हुआ है। मनः, वचन और काय। कायवाङ्मनः कर्म उसके साथ में होने वाला योग यह कहलाएगा मन, वचन और काय का योग। छठवें अध्याय के प्रथम सूत्र को जब आप पढ़ेंगे तो ज्ञात होगा कि यह योग की परिभाषा है। वह योग पूरा का पूरा अपनी शारीरिक गतिविधियों और भौतिक शरीर पर निर्भर करता है। मन, वचन और काय की सारी क्रियाएं हमारे औदारिक शरीर में घटित होती हैं। इन क्रियाओं के माध्यम से आत्मा के प्रदेशों में जो परिस्पन्दन होता है उसका नाम वहाँ योग कहा गया है। इसलिए वहाँ जो योग है वह अपने भौतिक शरीर से सम्बन्धित है, वह योग अपनी स्पीच, माइंड और शरीर से सम्बन्धित हैं और यहाँ जो योग कहा जा रहा है यह है कर्मयोग । कर्मयोग से तात्पर्य कर्म के माध्यम से होने वाला योग। कई बार शब्द वही रहते हैं परन्तु अलग-अलग स्थानों पर उनके अर्थ बदल जाया करते हैं। वहाँ कर्म का अर्थ हुआ-मन, वचन, काय की क्रिया और यहाँ पर कर्म का अर्थ हो गया कार्मण शरीर। हमारे अन्दर कर्म बंध हुए हैं उसका नाम यहाँ पर कर्म है। एक ही शब्द अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग अर्थ रख रहा है। वहाँ पर कर्मयोग से तात्पर्य मन, वचन, काय की क्रियाओं के नाम से हैं । यहाँ पर कहते हैं-केवल कर्मयोग । यहाँ पर मन, वचन, काय नहीं जुड़ा हुआ है। क्योंकि इस सूत्र से आपको एक अलग गति में ले जा रहे हैं जिसका नाम है-विग्रहगति। जो गति दों गतियों के बीच में है। मान लो आप मनुष्य है और मनुष्य पर्याय जब छूटेगी और आपको देव पर्याय में जाना है। अभी आप देव गति में पहुँचे नहीं हैं। जिस स्थान पर आपका जन्म होना है उस स्थान पर आप अभी नहीं पहुँचे और पूर्व स्थान को भी आपने छोड़ दिया तो बीच में आप जब तक रहेंगे उसका नाम ही विग्रहगति कहलाएगा। इस गति में आप किसके साथ रहेंगे? आचार्य यहाँ पर कह रहे है-“कर्मयोगः” उस समय भी आप योगी रहेंगे और इस समय भी आप योगी रहेंगे। क्योंकि योग जिसके पास है वह होता है योगी। तो योग उस समय पर किसका रहेगा? कार्मण शरीर आपके साथ होगा। इसी का नाम 54
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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