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________________ जीव-विज्ञान उसके दोनों कानों में कैंसर हो गया। डॉ. ने उसके कैंसर का कारण बताया ज्यादा मोबाइल का प्रयोग करने से इसको कैंसर हो गया। डॉ. ने कह दिया अब मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाना है। ऐसी भयंकर बीमारियाँ इन उपकरणों के अधिक प्रयोग से हो जाती हैं। अब इन इन्द्रियों का हमने उपयोग किया या दुरुपयोग किया। तो यह दुरुपयोग कहलाया। हमें यह इन्द्रिय मिली थी कुछ पुण्य के उदय से, कुछ और उपयोग करने के लिए। हमने इसका इतना दुरुपयोग किया कि वह हमारे लिए कैंसर का कारण बन गया। उस खबर को सुनने के बाद लोगों को अहसास हुआ कि मोबाइल से भी कैंसर होता है। यह कहलाता है इनका दुरुपयोग । अर्थात् हमने कोई बहुत पुण्य किये थे उससे हमें इन इन्द्रियों की प्राप्ति हुई। उस उपलब्धि पर तो हमने ध्यान नहीं दिया, अन्य उपलब्धियों को मानकर हम उनके पीछे दौड़ने लगे और उसके कारण इस प्राप्त धन को हमने खो दिया। ये इन्द्रियाँ हमारा बहुत बड़ा धन है। इस धन पर तो हमने ध्यान नहीं किया और इसकी हानि कर ली तो यह एक तरह का आत्मघात हो गया। केवल मरने का नाम ही आत्मघात नहीं होता। अपनी इन्द्रियों को अपनी अज्ञानता से घात पहुँचाना भी आत्मघात कहलाता है। आचार्य कहते हैं इन इन्द्रियों की उपलब्धियाँ हमें हुई हैं। हमें यह समझना है ये कैसे हुई हैं? यह हमारे बहुत बड़े पुण्य कर्मों का फल है। यह हमें कभी ध्यान नहीं रहता और हम दूसरी चीजों में उलझते रहते हैं। उन दूसरी चीजों को उपलब्ध करने को हम उपलब्धियाँ समझते रहते हैं। इस शरीर को हमने कैसे प्राप्त किया है? यह विचार हमारे अंदर कभी नहीं आता है। इसीलिए लोग आत्महत्या कर लेते हैं। हमें यह समझना है कि इस मनुष्य पर्याय में हमें इन इन्द्रियों का घात नहीं करना है। इन इन्द्रियों के विषयों के विषय में आचार्य आगे के सूत्र में बताते हैं स्पर्शरसगन्धवर्ण-शब्दास्तदर्थाः ।। 201। अर्थ-स्पर्श, रस, गन्ध, रूप और शब्द ये क्रम से (ऊपर कही हुई) पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। इस सूत्र में कहते हैं स्पर्श इन्द्रिय स्पर्श को ही ग्रहण करेगी, रसना इन्द्रिय रस को ग्रहण करेगी, घ्राण इन्द्रिय गंध को ग्रहण करेगी, चक्षु इन्द्रिय वर्ण (रंग) को और श्रोत्र इन्द्रिय शब्द को ग्रहण करेगी। इन पाँच इन्द्रियों के अपने-अपने कार्य हैं और इनके अपने-अपने विषय हैं। कोई भी इन्द्रिय किसी को भी बाधित नहीं करती है। सभी इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं और इन इन्द्रियों के माध्यम से ही आत्मा में सुख-दुःख का वातावरण बनता रहता है। जिसे इन्द्रिय के विषय अनुकूल मिल जाते हैं वह सुखी होता है। जिसको प्रतिकूल मिलते हैं वह दुःखी होता है। ये सभी इन्द्रिय के विषय हैं जिसका आत्मा उपभोग करता रहता है। इन पाँच विषयों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता है। अब इन पाँच इन्द्रियों के जो विषय है वे सारे मूर्तिक होंगे। जिन पदार्थों का हम सेवन करेंगे उन पदार्थों में इन पाँचों ही चीजों से सम्बन्धित गुण होंगे। ये गुण पुद्गल पदार्थों में पाए जाते हैं। इसलिए हम इन पाँच इन्द्रियों के माध्यम से जिन पदार्थों का सेवन करते हैं वे केवल पौद्गलिक 48
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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