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________________ जीव-विज्ञान पाँच लब्धियाँ जिसे हम क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि, प्रायोग्यलब्धि और करणलब्धि कहते हैं। इनके प्राप्त होने पर सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। इसमें जो क्षयोपशमभाव हैं उनमें क्या विशेषता होती है? आचार्य कहते हैं कि वह विशेषता कर्म के कारण आती है। कर्म में कुछ ऐसी परिणतियाँ हो जाती हैं कि कर्म की सर्वघाती प्रकृतियाँ होती है उनको हम दबा देते हैं और कुछ ऐसी शक्तियाँ जो घात करने का काम नहीं करती हैं वह उदय में आ जाती हैं और क्षयोपशमभाव बन जाते हैं। इस प्रकार के क्षयोपशम भाव बनने पर सम्यक्त्व भी क्षयोपशम भाव के रूप में आ जाता है। जो सात कर्म हैं जो उपशम को प्राप्त हुए थे उनमें एक सम्यक् प्रकृति का उदय आ गया तो वह क्षयोपशम सम्यग्दर्शन कहलाने लग गया । क्योंकि उस सम्यक्त्व प्रकृति में देशघाती स्पर्द्धकों का उदय चल रहा है। उस सम्यक्त्व प्रकृति में इतनी क्षमता नहीं है कि वह हमारे सम्यग्दर्शन का घात कर सके। इसलिए इसका नाम क्षयोपशम सम्यग्दर्शन है। इसी तरह क्षयोपशम चारित्र भी होता है। जिसके होने पर हम अपने चारित्र गुण का पालन कर सकते हैं। चारित्र पर आवरण करने वाले कर्मों का अभाव होने पर वह क्षयोपशम चारित्र प्रकट होता है। आचार्य संयमासंयम के विषय में बताते हुए कहते हैं- संयमासंयम को भी क्षयोपशम भाव के रूप में ही कहा गया है। क्षयोपशम भाव में कुछ ऐसे कर्म उदय में आ जाते हैं जिसके कारण चारित्र उत्पन्न होने लगता है, चारित्र में बाधा उत्पन्न नहीं होती है। उन्हें देशघाती कर्म कहते हैं । चारित्र-मोहनीय के देशघाती कर्म जब उदय में रहते हैं उनके कारण से कुछ और कर्म ऐसे होते हैं जो सर्वघाती का कार्य करते हैं। उनके कारण ऐसा भाव बन जाता है जिसे संयमासंयम भाव कहते हैं। यह कर्म-सिद्धान्त की अपेक्षा से हो गया । इसलिए और अच्छी तरह से आप अपने आचरण की अपेक्षा से समझ सकते हैं- ऐसे व्यक्ति जिन्होंने संयम धारण किया हो। जो घर में रहकर देशव्रतों का पालन करते हैं वह भी संयमासंयमी कहलाते हैं। दो प्रतिमाओं से लेकर ग्यारह प्रतिमाओं तक श्रावक धर्म का पालन करने वाले सभी जीव संयमासंयमी कहलाते हैं । इनको संयमासंयमी इसलिए कहते हैं। कि इनमें कुछ संयम प्रकट रहता है और कुछ असंयम भी बना रहता है। संयम प्रकट होने से तात्पर्य सजीवों की हिंसा का त्याग होता चला जाता है, त्रस जीवों की हिंसा से विरक्ति बढ़ती चली जाती है इससे संयम का भाव हो गया। लेकिन स्थावर जीवों की हिंसा का असंयम भाव उनके बना रहता है। इसलिए इनमें संयम और असंयम दोनों प्रकार के भाव बने रहते हैं। ये दोनों मिलकर संयमासंयम कहलाते हैं। आपने देखा होगा कि जिनके दो प्रतिमाएँ होती हैं जब वह भोजन करेंगे तो प्रासुक जल का ही उपयोग करेंगे लेकिन नहाने धोने के लिए दूसरे पानी का भी उपयोग कर सकते हैं। इस तरह से उनमें संयम और असंयम दोनों पलते हैं। जो वस्त्र रखेंगे, तो उसको धोने का, सुखाने का, ये सभी कार्य उनके स्थावर आदि की हिंसा का कारण बनेंगे और उसमें यह ध्यान अवश्य रखेंगे कि 22
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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