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________________ जीव-विज्ञान की आराधना करने से अपने अंदर ज्ञान बढ़ता है। इन सूत्रों को आप स्मरण करेंगे तो आपके अंदर श्रुतज्ञान का क्षयोपशम बढ़ेगा और यही क्षयोपशम आगे और अन्य ज्ञान के क्षयोपशम को बढ़ाने में कारण बनेगा। इसलिए हमें अपना श्रुतज्ञान बढ़ाना है तो इस श्रुत की विनय पूर्वक आराधना करनी चाहिए। शंका- कुअवधिज्ञान से क्या तात्पर्य है? समाधान-कुअवधिज्ञान से अभिप्राय है कि जिनमें अवधिज्ञान तो है परन्तु मिथ्यात्व के साथ में है तो उसे कुअवधिज्ञान कहेंगे और यह कुअवधिज्ञान सभी जीवों में पाया जा सकता है। मुख्य रूप से देव और नारकियों में नियम से होता है। यदि देव और नारकी जीव सम्यग्दृष्टि होते हैं तो उनका ज्ञान अवधिज्ञान कहलाएगा, और यदि मिथ्यादृष्टि होते हैं तो उनका वह ज्ञान कुअवधिज्ञान कहलाएगा। मनुष्यों में भी और तिर्यंचों में भी यह ज्ञान उपलब्ध हो जाता है। वह किसी-किसी को ही होता है और यह मिथ्यात्व के साथ भी होता है और सम्यक्त्व के साथ भी होता है। नियामकता देव और नारकी पर्यायों में होती है। शंका- लब्धि किसे कहते हैं? समाधान-लब्धि का अर्थ होता है-प्राप्ति या उपलब्धि जिसे हम आजकल achievement कहते हैं। आप कोई जॉब करते हैं तो कहते हैं कि हमने कुछ achieve कर लिया, हमने अपना status बना लिया, ये भी इसी प्रकार का achievement कहलाता है। आपको यह ज्ञान मिला है, दान, लाभ, भोग, उपभोग और आत्मा की यह शक्ति प्रगट हुई है, यह आपका बहुत बड़ा achievement है। ये आपकी उपलब्धियाँ हैं। जिस उपलब्धि से आप अपने ज्ञान को संभाले हुए हो, दान देने की क्षमता रखते हो, दूसरों की सहायता करने की आपमें क्षमता है। दूसरों को लाभ पहुँचा सकते हो और अपने लिए भी भोग, उपभोग की सामग्री इकट्ठी कर सकते हो या उसका उपभोग कर सकते हो। ये जो हमारे अन्दर क्षमताएँ उत्पन्न हुई हैं, इन्हीं क्षमताओं को लब्धि कहा जाता है। ये क्षमताएँ नहीं होती तो हम इस प्रकार की कोई भी उपलब्धियाँ प्राप्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए ये लब्धियाँ है। दूसरी लब्धि वह है जो सम्यग्दर्शन के परिणामों को उत्पन्न करने के लिए प्राप्त की जाती है। अर्थात् कुछ विशेष achievment को, विशुद्ध भावों को भी पाँच लब्धियाँ कहते हैं। ये लब्धियाँ हैं वह सभी के लिए सामान्य है। जैसे-सभी मनुष्य सामान्य होते हैं फिर उसमें से कुछ इंजीनियर बनते हैं, कुछ डॉक्टर बनते हैं, अपनी अलग-अलग तरह की जॉब करते हैं। उसी तरह से ये पाँच अन्तराय कर्म की लब्धियाँ है ये तो सभी जीवों में है, ये तो सामान्य है। परन्तु आपको सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए कुछ भाव करने पड़ेंगे। वे भाव केवल मनुष्य ही कर पाएंगे, जो इस प्रकार से तत्वार्थ का श्रद्धान करेंगे उन्हीं को होगा। इस तरह से जो विशुद्ध भाव जिनमें उत्पन्न होंगे वे विशेष जीव कहलाएंगे। उनको लब्धियाँ प्राप्त होने पर सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है इसलिए उनका नाम भी लब्धि कहा गया है। हम इसे इस तरह से भी समझ सकते हैं। एक सामान्य लब्धि और दूसरी सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने की 21
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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