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________________ wwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww कभी राजसभा में गये थे, न किसी चैत्यवासी के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ था और न राजा दुर्लभ ने खरतर बिरुद ही दिया था। इस विषय के लिये खरतर मतोत्पत्ति भाग १-२-३-४ आपके करकमलों में विद्यमान हैं, जिसको पढ़ कर आप अच्छी तरह से निर्णय कर सकते हैं। कहा जाता है कि 'हारा जुगारी दूणो खेले' इस युक्ति को चरितार्थ करते हुए खरतरों ने जिनेश्वरसूरि का कल्पित चित्र बना कर उसके नीचे लेख लिख दिया है कि 'उपकेशगच्छीय चैत्यवासियों को परास्त किया' भला कभी जिनेश्वरसूरि आकर खरतरों को पूछे कि अरे भक्तो ! मैं कब पाटण की राजसभा में गया था और कब उपकेशगच्छीय चैत्यवासियों के साथ शास्त्रार्थ किया था और कब राजा दुर्लभ ने मुझे खरतर बिरुद दिया था, तुमने यह मेरे पर झूठा आक्षेप क्यों लगाया है? उपकेशगच्छ के आचार्यों को तो मैं पूज्य भाव से मानता हूँ क्योंकि उन्होंने लाखों करोड़ों आचारपतित क्षत्रियों को जैन धर्म से दीक्षित कर 'महाजन-संघ' की स्थापना की थी। उन्हीं ओसवाल, पोरवाल और श्रीमालों ने जैन धर्म को जीवित रक्खा है और तुम्हारी भी सहायता करते हैं। तथा उपकेशगच्छीय आचार्य यक्षदेवसूरि ने आर्य वज्रसेन के ४ शिष्यों को ज्ञानदान और शिष्यदान दे कर उनके चन्द्र, नागेन्द्र, विद्याधर और निवृत्ति कुल स्थापन किये, जिसमें चन्द्रकुल में मैं भी हूँ तो उनका उपकार कैसे भूला जाय? तथा उपकेशगच्छीय देवगुप्तसूरि ने देवद्धिगणि क्षमाश्रमण को दो पूर्व का ज्ञान पढ़ा कर क्षमाश्रमण पद दिया था कि जिन्होंने आगमों को पुस्तकारुढ़ कर जैन समाज पर महान उपकार किया है, इतना ही क्यों पर मैं खुद उपकेशगच्छाचार्यों के पास पढ़ा हूँ। अतः उन महा उपकारी पुरुषों के उपकार के बदले मेरे नाम से इस प्रकार मिथ्या आक्षेप करना यह संसार-वृद्धि का ही कारण है इत्यादि। इसका आधुनिक खरतर क्या उत्तर दे सकते हैं? शर्म ! शर्म !! महाशर्म !!! कि खरतरों ने अपना कलंक छिपाने के लिए एक महान उपकारी पुरुषों के ऊपर मिथ्या दोषारोपण कर दिया है, परन्तु आज बीसवीं शताब्दी और ऐतिहासिक युग में ऐसे कल्पित चित्र और मिथ्या लेखों की फूटी कौड़ी जितनी भी कीमत नहीं है। खरतरों ! अब भी समय है कि ऐसे चित्र और मिथ्या लेखों को शीघ्र हटा दो वरन् तुम्हारे हक में ठीक न होगा इसको अच्छी तरह सोच लेना चाहिए। - केसरीचन्द चोरड़िया
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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