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________________ १४७ आदमियों ने जाकर चैत्यवासियों से कहा और वे चैत्यवासी राजसभा में आये और उधर पुरोहित भी राजसभा में गया। पुरोहित सोमेश्वर ने कहा कि मेरे यहां दो श्वे. साधु आये हैं, मैंने उनको ठहरने के लिये मकान दिया है। यदि इसमें मेरा कुछ अपराध हुआ हो तो मुझे मुनासिब दण्ड फरमावें । इधर चैत्यवासियों ने राजा वनराज चावड़ा से अपना इतिहास सुना कर पाटण नगर में चैत्यवासियों की सत्ता साबित की जिसके सामने राजा को सिर झुकाना पड़ा। फिर भी राजा ने चैत्यवासियों से साग्रह प्रार्थना की कि हमारे नगर से कोई भी गुणीजन अपमानित होकर जाये इसको मैं ठीक नहीं समझता हूँ। अतः आप हमारी प्रार्थना को स्वीकार कर इन साधुओं को नगर में ठहरने की आज्ञा फरमावें । इस पर उन चैत्यवासियों ने राजा के कहने को स्वीकार कर लिया। और पुरोहित की प्रार्थना पर राजा ने उन साधुओं के लिये थोड़ा सा भूमिदान दिया। जहां पुरोहित ने एक मकान बनवाया और जिनेश्वरसूरि ने वहां चातुर्मास किया। जो इस प्रकार साधु के लिये बनाये हुए मकान में साधु को पैर रखने की भी मनाई है। आचारांगसूत्र में सावध क्रिया एवं वज्र क्रिया कही है तब दशवैकालिक में भ्रष्टाचारी कहा है और निशीथ सूत्र में दण्ड बतलाया है। खैर ! चातुर्मास समाप्त होने के बाद जिनेश्वरसूरि धारा नगरी की ओर विहार कर गये। बस इतनी बात बनी थी। इसमें न तो जिनेश्वरसूरि राजसभा में गये थे न शास्त्रार्थ हुआ और न राजा ने खरतर बिरुद दिया तथा न इस घटना का समय वि. सं. १०८० का ही था, उपरोक्त बात खरतरों की भांति किंवदंति या कल्पना मात्र ही नहीं है पर खरतरों के खास भाई रुद्रपालीगच्छीय संघतिलकसूरि स्वरचित 'दर्शनसप्तति' में तथा प्रभाचन्द्रसूरि ने प्रभावकचरित्र में लिखी है जो दोनों सर्वमान्य प्रमाणिक ग्रन्थ हैं। खरतरों ने रज का गज और काग का बाग किस प्रकार बनाया है ? पाठक स्वयं सोच कर समझ सकते हैं। यदि जिनेश्वरसूरि को शास्त्रार्थ की विजय में ही खरतर बिरुद मिला होता तो यह कोई लज्जा की बात नहीं थी की उनके पिछले आचार्य इस बिरुद को छिपा कर रखते । जिनेश्वरसूरि, बुद्धिसागरसूरि, प्रश्नचन्द्रसूरि, धनेश्वरसूरि, देवभद्रसूरि, हरिभद्रसूरि, जिनचन्द्रसूरि, अभयदेवसूरि, वर्धमानसूरि, पद्मप्रभसूरि, जिनवल्लभसूरि, जिनशेखरसूरि, जिनदत्तसूरि, जिनचन्द्रसूरि, जिनपतिसूरि आदि आचार्यों ने तथा इनके बहुत साधुओं ने कई ग्रन्थों की रचना की है पर कहीं पर यह नहीं लिखा कि जिनेश्वरसूरि को खर-तर बिरुद मिला था या हम खरतर है। परन्तु उन्होंने तो
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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