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________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक कालक्रमे उसने सावधाचार्य के जीव को बच्चे के रूप में जन्म दिया । जन्म देकर तुरन्त ही वो बच्चे का त्याग करके मौत के डर से अति त्रस्त होनेवाली वहाँ से भाग गई । हे गौतम ! जब वो एक दिशा से भागी और उस चंडाल को पता चला कि वो पापीणी भाग गई है। वध करनेवाले के आगेवान ने राजा को बिनती की, हे देव ! केल के गर्भ समान कोमल बच्चे का त्याग करके दुराचारिणी तो भाग चली । देव राजा ने प्रत्युत्तर दिया कि भले भाग गई तो उसे जाने दो, लेकिन उस बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करना । सर्वथा वैसी कोशीश करना कि जिससे वो बच्चा मर न जाए । उसके खर्च के लिए यह पाँच हजार द्रव्य ग्रहण करो । उसके बाद राजा के हुकुम से पुत्र की तरह उस कुलटा के पुत्र का पालन-पोषण किया, कालक्रम से वो पापकर्मी फाँसी देनेवाले का अधिपति मर गया। तब राजा ने उस बच्चे को उसका बारिस बनाया । पाँचसौ चंडाल का अधिपति बनाया । वहाँ कसाई के अधिपति पद पर रहनेवाला वो उस तरह के न करने लायक पापकार्य करके अप्रतिष्ठान नाम की सातवीं नारक पृथ्वी में गया इस प्रकार सावधाचार्य का जीव सातवीं नारकी के वैसे घोर प्रचंड़, रौद्र, अति भयानक दुःख तेंतीस सागरोपम के लम्बे अरसे तक महाक्लेश पूर्वक महसूस करके वहाँ से नीकलकर यहाँ अंतरद्वीप में एक ऊंरुग जाति में पैदा हुआ । वहाँ से मरकर तिर्यंच योनि में पाड़े के रूप में पैदा हुआ । वहाँ भी किसी नरक के दुःख हो उसके समान नामवाले दुःख छब्बीस साल तक भुगतकर उसके बाद हे गौतम ! मरके मानव में जन्म लिया । वहाँ से नीकलकर उस सावधाचार्य का जीव वसुदेव के रूप में पैदा हुआ । वहाँ भी यथा उचित आयु परिपूर्ण करके कईं संग्राम आरम्भ महापरिग्रह के दोष से मरकर सातवीं नारकी में गया । वहाँ से नीकलकर काफी दीर्घकाल के बाद गजकर्ण नाम की मानव जाति में पैदा हुआ । वहाँ भी माँसाहार के दोष से क्रूर अध्यवसाय की मतिवाला मरके फिर सातवीं नारकी के अप्रतिष्ठान नरकावास में गया । वहाँ से नीकलकर फिर तिर्यंचगति में पाड़े के रूप में पैदा हुआ । वहाँ नरक समान पारावार दुःख पाकर मरा । फिर बाल विधवा कुलटा ब्राह्मण की पुत्री की कुक्षि में पैदा हुआ। अब उस सावधाचार्य का जीव कुलटा के गर्भ में था तब गुप्त तरीके से गर्भ को गिराने के लिए, सड़ने के लिए क्षार, औषध योग का प्रयोग करने के दोष से कईं व्याधि और वेदना से व्याप्त शरीरवाले, दुष्ट व्याधि से सड़नेवाले परु झरित, सल सल करते कृमि के समूहवाला वो कीड़ों से खाए जानेवाला, नरक की उपमावाले, घोर दुःख के निवासभूत बाहर नीकला । हे गौतम ! उसके बाद सभी लोग से निन्दित, गर्हित, दुगुंछा करनेवाला, नफरत से सभी लोक से पराभव पानेवाला, खान, पान, भोग, उपभोग रहित गर्भावास से लेकर सात साल, दो महिने, चार दिन तक यावज्जीव जीकर विचित्र शारीरिक, मानसिक, घोर दुःख से परेशानी भुगतते हुए मरकर भी व्यंतर देव के रूप में पैदा हुआ । वहाँ से च्यवकर मनुष्य हुआ। फिर वध करनेवाले का अधिपति और फिर उस पापकर्म के दोष से सातवीं में पहुँचा । वहाँ से नीकलकर तिर्यंच गति में कुम्हार के यहाँ बैल के रूप में पैदा हुआ । वहाँ से च्यवकर मनुष्य हुआ। फिर वध करनेवाले का अधिपति, और फिर उस पापकर्म के दोष से सातवीं में पहुंचा। वहाँ से नीकलकर तिर्यंच गति में कुम्हार के वहाँ बैल के रूप में पैदा हुआ । उसे वहाँ चक्की, गाड़ी, हल, अरघट्ट आदि में जुड़कर रात-दिन घुसरी में गरदन घिसकर फोल्ले हो गए और भीतर सडा गया । खम्भे में कृमि पैदा हुई । अब जब खांध घोसरी धारण करने के लिए समर्थ नहीं है ऐसा मानकर उसका स्वामी कुम्हार इसलिए पीठ पर बोझ वहन करवाने लगा । अब वक्त गुजरने से जिस तरह खाँध में सडा हो गया उस तरह पीठ भी घिसकर सड़ गई । उसमें भी कीड़े पैदा हो गए । पूरी पीठ भी सड़ गई और उसके ऊपर का चमड़ा नीकल गया और भीतर का माँस दिखने लगा । उसके बाद अब यह कुछ काम नहीं कर सकेगा, इसलिए निकम्मा है, ऐसा मानकर छोड़ दिया । हे गौतम ! उस सावधाचार्य का जीव सलसल कीड़ों से खाए जानेवाले बैल को छोड़ दिया। उसके बाद काफी सड़े हुए चर्मवाले, कईं कौए-कुत्ते-कृमि के कुल से भीतर और बाहर से खाए जानेवाला काटनेवाला उनतीस साल तक आयु पालन करके मरकर कईं व्याधि वेदना से व्याप्त शरीरवाला मानवगति में अति धनिक किसी बड़े घर के आदमी के वहाँ जन्म लिया । वहाँ भी वमन करने के खाश, कटु, तीखे, कषे हुए, स्वादिष्ट, मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 94
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
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