________________
आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ'
अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक भगवंत ! किस कारण से? हे गौतम ! सुश्रमण या सुश्रावक यह दो भेद ही बताए हैं । तीसरा भेद नहीं बताया । या तो भगवंत ने शास्त्र में जिस प्रकार उपदेश दिया है, उस प्रकार सुश्रमणपन पालन करो । उसी प्रकार सुश्रावकपन यथार्थ तरह से पालन करना चाहिए । लेकिन श्रमण को अपने श्रमणपन में अतिचार नहीं लगने देने चाहिए या श्रावक को श्रावकपन के व्रत में अतिचार नहीं लगाने चाहिए । निरतिचार व्रत प्रशंसा के लायक है । वैसे निरतिचार व्रत का पालन करना चाहिए | जो इस श्रमणधर्म सर्वविरति स्वरूप होने से निर्विकार छुटछाट बिना सुविचार और पूर्ण सोचयुक्त है । जिस प्रकार महाव्रत का पालन शास्त्रमें बताया है । उस प्रकार यथार्थ पालन करना चाहिए । जब कि श्रावक के लिए तो हजार तरह के विधान हैं । वो व्रत पालन करे और उसमें अतिचार न लगे उस प्रकार श्रावक अणुव्रत ग्रहण करे । सूत्र - ६८३
हे भगवंत ! वो नागिल श्रावक कहाँ पैदा हुआ ? हे गौतम ! वो सिद्धिगति में गया । हे भगवंत ! किस तरह? हे गौतम ! महानुभाव नागिल ने उस कुशील साधु के पास से अलग होकर कईं श्रावक और पेड़ से व्याप्त घोर भयानक अटवी में सर्व पाप कलिमल के कलंक रहित चरम हितकारी सेंकडों भव में भी अति दुर्लभ तीर्थंकर भगवंत का वचन है ऐसा मानकर निर्जीव प्रदेश में जिसमें शरीर की परवा टाप-टीप न करना पड़े वैसा निरतिचार पादपोपगमन अनशन अंगीकार किया । अब किसी समय उसी प्रदेश में विचरते अरिष्टनेमि त अचलित सत्त्ववाले इस भव्यात्मा के पास उसके अहेसान के लिए आ पहुँचे । उत्तमार्थ समाधिमरण साधनेवाले अतिशयवाली देशना कही । जलवाले मेघ के समान गम्भीर और देव दुंदुभि समान सुन्दर स्वरवाली तीर्थंकर की वाणी श्रवण करते करते शुभ अध्यावसाय करने से अपूर्वकरण से क्षपक श्रेणी में आरूढ़ हुआ । अंतकृत् केवली बना । उसने सिद्धि पाई । इसलिए हे गौतम ! कशील संसर्गी का त्याग करनेवाले को इतना अंतर होता है।
अध्ययन-४-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
इस चौथे अध्ययन में सिद्धांतज्ञाता कुछ आलापक की सम्यग् श्रद्धा नहीं करते । वो अश्रद्धा करते रहते हैं इसलिए हम भी सम्यग् श्रद्धा नहीं करते ऐसा आचार्य हरिभद्रसूरिजी का कथन है। पूरा चौथा अध्ययन अकेला ही नहीं, दूसरे अध्ययन भी इस चौथे अध्ययन के कुछ परिमित आलापक का अश्रद्धान् करते हैं ऐसा भाव समजो । क्योंकि स्थान, समवाय, जीवाभिगम, प्रज्ञापना आदि सूत्र में वो कोई भी हकीकत बताई नहीं है कि प्रति संतापक जगह है । उसकी गुफा में वास करनेवाले मानव है। उसमें परमाधार्मिक असुर का साँत-आँठ बार उत्पात् होता है, उन्हें दारूण वज्रशीला की चक्की पटल के बीच पीसना पड़ता है। अति पिले जाने से दर्द का अहेसास होने के बाद भी एक साल तक उनके प्राण नष्ट नहीं होते । (लेकिन) वृद्धवाद ऐसे है कि यह आर्षसूत्र है, उसमें विकृति का प्रवेश नहीं हुआ। इस श्रुतस्कन्ध में काफी अर्थपूर्णता है। सुंदर अतिशय सहित सातिशय युक्त कहे यह गणधर के वचन है। ऐसा होने से सहज भी यहाँ शंका मत करना।
मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद
Page 68