SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 42
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम सूत्र ३९, छेदसूत्र-५, 'महानिशीथ' अध्ययन/उद्देश/सूत्रांक सूत्र और अर्थ प्ररूपेल हैं । वो इस प्रकार - जिस कारण के लिए तल में तैल, कमल में मकरन्द, सर्वलोक में पंचास्तिकाय फैले रहे हैं । उसी तरह यह पंचमंगल महाश्रुतस्कंध के लिए समग्र आगम के भीतर यथार्थ क्रिया व्यापी है । सर्वभूत के गुण स्वभाव का कथन किया है । तो परम स्तुति किसकी करे ? इस जगत में जो भूतकाल में हो उसकी । इस सर्व जगत में जो कुछ भूतकाल में या भावि में उत्तम हुए हो वो सब स्तुति करने लायक हैं वैसे सर्वोत्तम और गुणवाले हो वे केवल अरिहंतादिक पाँच ही हैं, उसके अलावा दूसरे कोई सर्वोत्तम नहीं है, वो पाँच प्रकार के हैं - अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु । यह पाँच परमेष्ठि के गर्भार्थ-यथार्थ गुण सद्भाव हो तो वो इस प्रकार बताए हैं। मनुष्य, देव और असुरवाले इस सर्व जगत को आठ महाप्रातिहार्य आदि के पूजातिशय से पहचाननेवाले, असाधारण, अचिन्त्य प्रभाववाले, केवलज्ञान पानेवाले, श्रेष्ठ उत्तमता को वरे हुए होने से अरहंत', समग्र कर्मक्षय पाए हुए होने से जिसका भवांकुर समग्र तरीके से जल गया है, जिससे अब वो फिर से इस संसार में उत्पन्न नहीं होते । इसलिए उन्हें अरूहंत भी कहते हैं । या फिर अति दुःख से करके जिन पर विजय पा सकते हैं वैसे समग्र आठ कर्मशत्रुओं को निमर्थन करके वध किया है । निर्दलन टुकड़े कर दिए हैं, पीगला दिए हैं । अंत किया है, परिभाव किया है, यानि कर्म समान शत्रुओं को जिन्होंने हमेशा के लिए वध किया है । ऐसे 'अरिहंत' कहा है। इस प्रकार इस अरिहंत की कई प्रकार से समज दी है, प्रज्ञापना की जाती है, प्ररूपणा की जाती है । कहलाते हैं । पढ़ाते हैं, बनाते हैं, उपदेश दिया जाता है। और सिद्ध भगवंत परमानन्द महोत्सव में महालते, महाकल्याण पानेवाले, निरूपम सुख भुगतनेवाले, निष्कंप शक्लध्यान आदि के अचिंत्य सामर्थ्य से अपने जीववीर्य से योग निरोध करने समान महा कोशीश से जो सिद्ध हुए हैं । या तो आठ तरह के कर्म का क्षय होने से जिन्होंने सिद्धपन की साधना का सेवन किया है, इस तरह के सिद्ध भगवंत या शुक्लध्यान समान अग्नि से बंधे कर्म भस्मीभूत करके जो सिद्ध हुए हैं, वैसे सिद्ध भगवंत सिद्ध किए हैं, पूर्ण हुए हैं, रहित हुए हैं, समग्र प्रयोजन समूह जिनको ऐसे सिद्ध भगवंत ! यह सिद्ध भगवंत स्त्री-पुरुष, नपुंसक, अन्यलिंग गृहस्थलिंग, प्रत्येकबुद्ध, स्वयंबुद्ध यावत् कर्मक्षय करके सिद्ध हुए-ऐसे कई तरह के सिद्ध की प्ररूपणा की है (और) अठ्ठारह हजार शीलांग के आश्रय किए देहवाले छत्तीस तरह के ज्ञानादिक आचार प्रमाद किए बिना हमेशा जो आचरण करते हैं, इसलिए आचार्य, सर्व सत्य और शिष्य समुदाय का हित आचरण करनेवाले होने से आचार्य, प्राण के परित्याग वक्त में भी जो पृथ्वीकाय आदि जीव का समारम्भ, आचरण नहीं करते । या आरम्भ की अनुमोदना जो नहीं करते, वो आचार्य बड़ा अपराध करने के बावजूद भी जो किसी पर मन से भी पाप आचरण नहीं करते यों आचार्य कहलाते हैं । इस प्रकार नाम-स्थापना आदि कईं भेद से प्ररूपणा की जाती है। (और) जिन्हों ने अच्छी तरह से आश्रवद्वार बन्ध किए हैं, मन, वचन, काया के सुंदर योग में उपयोगवाले, विधिवत् स्वर-व्यंजन, मात्रा, बिन्दु, पद, अक्षर से विशुद्ध बारह अंग, श्रुतज्ञान पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले एवं दूसरे और खुद के मोक्ष उपाय जो सोचते हैं-उसका ध्यान धरते हैं वो उपाध्याय । स्थिर परिचित किए अनन्तगम पर्याय चीज सहित द्वादशांगी और श्रुतज्ञान जो एकाग्र मन से चिन्तवन करते हैं, स्मरण करते हैं, ध्यान करते हैं, वो उपाध्याय । इस प्रकार कईं भेद से उसकी व्याख्या करते हैं। अति कष्टवाले उग्र उग्रतर घोर तप और चारित्रवाले, कईं व्रत-नियम उपवास विविध अभिग्रह विशेष, लन, समता रहित परिषह उपसर्ग सहनेवाले, सर्व दुःख रहित मोक्ष की साधना करनेवाले वो साधु भगवंत कहलाते हैं । यही बात चुलिका में सोचेंगे। एसो पंच नमोक्कारो-इन पाँच को किया गया नमस्कार क्या करेगा ? ज्ञानावरणीय आदि सर्व पापकर्म विशेष को हर एक दिशा में नष्ट करे वो सर्व पाप नष्ट करनेवाले । यह पद चुलिका के भीतर प्रथम उद्देशो कहलाए ‘एसो पंच नमोक्कारो सव्वपावप्पणासणो' यह उद्देशक इस तरह का है। मुनि दीपरत्नसागर कृत् (महानिशीथ) आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद Page 42
SR No.034707
Book TitleAgam 39 Mahanishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 39, & agam_mahanishith
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy