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________________ आगम सूत्र २९, पयन्नासूत्र-६, 'संस्तारक' [२९] संस्तारक पयन्नासूत्र-६- हिन्दी अनुवाद सूत्र-१ श्री जिनेश्वरदेव-सामान्य केवलज्ञानीओं के बारेमें वृषभ समान, देवाधिदेव श्रमण भगवान महावीर परमात्मा को नमस्कार करके; अन्तिम काल की आराधना रूप संथारा के स्वीकार से प्राप्त होनेवाली परम्परा को मैं कहता हूँ सूत्र -२ श्री जिनकथित यह आराधना, चारित्र धर्म की आराधना रूप है । सुविहित पुरुष इस तरह की अन्तिम आराधना की ईच्छा करते हैं, क्योंकि उनके जीवन पर्यन्त की सर्व आराधनाओं की पताका के स्वीकार रूप यह आराधना है। सूत्र-३ दरिद्र पुरुष धन, धान्य आदि में जैसे आनन्द मानते हैं, और फिर मल्ल पुरुष जय पताका पाने में जैसे गौरव लेते हैं और इसकी कमी से वो अपमान और दुान को पाते हैं, वैसे सुविहित पुरुष इस आराधना में आनन्द और गौरव को प्राप्त करते हैं। सूत्र-४,५ मणिकी सर्व जाति के लिए जैसे वैडूर्य, सर्व तरह के खुशबूदार द्रव्य के लिए जैसे चन्दन और रत्न में जैसे वज्र होता है तथा- सर्व उत्तम पुरुषों में जैसे अरिहंत परमात्मा और जगत के सर्व स्त्री समुदाय में जैसे तीर्थंकरों की माता होती है वैसे आराधना के लिए इस संथारा की आराधना, सुविहित आत्मा के लिए श्रेष्ठतर है। सूत्र-६ और वंश में जैसे श्री जिनेश्वर देव का वंश, सर्व कुल में जैसे श्रावककुल, गति के लिए जैसे सिद्धिगति, सर्व तरह के सुख में जैसे मुक्ति का सुख, तथासूत्र -७ सर्व धर्म में जैसे श्री जिनकथित अहिंसाधर्म, लोकवचन में जैसे साधु पुरुष के वचन, इतर सर्व तरह की शुद्धि के लिए जैसे सम्यक्त्व रूप आत्मगुण की शुद्धि, वैसे श्री जिनकथित अन्तिमकाल की आराधना में यह आराधना जरूरी है। सूत्र-८ समाधिमरण रूप यह आराधना सच ही में कल्याणकर है । अभ्युदय उन्नति का परमहेतु है । इसलिए ऐसी आराधना तीन भुवन में देवताओं को भी दुर्लभ है । देवलोक के इन्द्र भी समाधिपूर्वक के पंड़ित मरण की एक मन से अभिलाषा रखते हैं। सूत्र-९ विनेय ! श्री जिनकथित पंडित मरण तूने पाया । इसलिए निःशंक कर्म मल्ल को हणकर उस सिद्धि की प्राप्ति रूप जयपताका पाई। सूत्र-१० सर्व तरह के ध्यान में जैसे परमशुक्लध्यान, मत्यादि ज्ञान में केवलज्ञान और सर्व तरह के चारित्र में जैसे कषाय आदि के उपशम से प्राप्त यथाख्यात चारित्र क्रमशः मोक्ष का कारण बनता है। मुनि दीपरत्नसागर कृत् “(संस्तारक)” आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद” Page 5
SR No.034696
Book TitleAgam 29 Sanstarak Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages16
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 29, & agam_sanstarak
File Size2 MB
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