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________________ आगम सूत्र १५, उपांगसूत्र-४, 'प्रज्ञापना' पद/उद्देश /सूत्र सूत्र-१८५ दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और विनय में, सर्व समितियों और गुप्तियों में जो क्रियाभावरुचिवाला है, वह क्रियारुचि है। सूत्र-१८६ जिसने किसी कुदर्शन का अभिग्रहण नहीं किया है, और जो अर्हत्प्रणीत प्रवचन में पटु नहीं है, उसे संक्षेपरुचि समझना। सूत्र-१८७ जो व्यक्ति जिनोक्त अस्तिकायधर्म, श्रुतधर्म एवं चारित्रधर्म पर श्रद्धा करता है, उसे धर्मरुचि समझना। सूत्र-१८८ परमार्थ संस्तव, सुदृष्टपरमार्थ सेवा, व्यापन्नकुदर्शनवर्जना तथा सम्यग् श्रद्धा । यही सम्यग्दर्शन है। सूत्र - १८९ (सरागदर्शन के) ये आठ आचार हैं-निःशंकित, निष्कांक्षित, निर्विचिकित्स, अमूढदृष्टि, उपबृंहण, स्थिरीकरण, वात्सल्य और प्रभावना । सूत्र-१९० वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं। उपशान्तकषाय-वीतरागदर्शनार्य और क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य । उपशान्तकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । प्रथमसमय और अप्रथमसमय-उपशान्तकषायवीतरागदर्शनार्य अथवा चरमसमय और अचरमसमय-उपशान्तकषाय-वीतरागदर्शनार्य । क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । छद्मस्थ और केवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य । छद्मस्थ क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । स्वयं बुद्ध और बुद्धबोधित-छद्मस्थ-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य | स्वयंबुद्ध-छद्मस्थ-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । प्रथमसमय और अप्रथमसमय अथवा चरमसमय औचर अचरमसमय-स्वयंबुद्ध-छद्मस्थ-क्षीणकषायवीतरागदर्शनार्य । बुद्धबोधित-छद्मस्थ-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । प्रथमसमय और अप्रथमसमय अथवा चरमसमय और अचरमसमय बुद्धबोधित-छद्मस्थ-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य। केवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं-सयोगि और अयोगिकेवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य । सयोगि-केवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य किस प्रकार के हैं ? सयोगिकेवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । प्रथमसमय और अप्रथमसमय अथवा चरमसमय और अचरमसमय-सयोगिकेवलिक्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य | अयोगिकेवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य दो प्रकार के हैं । प्रथमसमय और अप्रथमसमय अथवा चरमसमय और अचरमसमय-अयोगिकेवलि-क्षीणकषाय-वीतरागदर्शनार्य । चारित्रार्य दो प्रकार के हैं, सराग और वीतरागचारित्रार्य । सरागचारित्रार्य दो प्रकार के हैं-सूक्ष्म और बादर-सम्पराय-सराग चारित्रार्य । सूक्ष्मसम्पराय-सरागचारित्रार्य दो प्रकार के हैं-प्रथमसमय और अप्रथमसमय अथवा चरमसमय और अचरमसमय-सूक्ष्मसम्पराय-सरागचारित्रार्य । अथवा सूक्ष्मसम्पराय-सरागचारित्रार्य दो प्रकार के हैं। संक्लिश्यमान और विशुद्धयमान | बादरसम्पराय-सरागचारित्रार्य दो प्रकार के हैं-प्रथम और अप्रथमसमय अथवा चरम और अचरमसमय-बादरसम्पराय-सराग-चारित्रार्य अथवा बादरसम्पराय-सराग-चारित्रार्य दो प्रकार के हैं । प्रतिपाति और अप्रतिपाती। वीतराग-चारित्रार्य दो प्रकार के हैं । उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय-वीतराग-चारित्रार्य । उपशान्तकषाय-वीतराग-चारित्रार्य दो प्रकार के हैं । प्रथम और अप्रथमसमय अथवा चरम और अचरमसमयउपशान्तकषाय-वीतरागचारित्रार्य । क्षीणकषाय-वीतराग-चारित्रार्य दो प्रकार के हैं । छद्मस्थ और केवलि-क्षीणकषायवीतराग-चारित्रार्य। छद्मस्थ-क्षीणकषाय-वीतराग-चारित्रार्य दो प्रकार के हैं । स्वयंबुद्ध और बुद्धबोधित । स्वयंबुद्ध-छद्मस्थ मुनि दीपरत्नसागर कृत् “ (प्रज्ञापना) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 21
SR No.034682
Book TitleAgam 15 Pragnapana Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages181
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 15, & agam_pragyapana
File Size4 MB
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