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________________ आगम सूत्र ११, अंगसूत्र-१, 'विपाकश्रुत' श्रुतस्कन्ध/अध्ययन/ सूत्रांक अभी मृगापुत्र बालक को दिखलाती हूँ।' इतना कहकर वह जहाँ भोजनालय था, वहाँ आकर वस्त्र-परिवर्तन करती है । लकड़े की गाड़ी ग्रहण करती है और उसमें योग्य परिमाण में अशन, पान, खादिम व स्वादिम आहार भरती है । तदनन्तर उस काष्ठ-शकट को खींचती हुई जहाँ भगवान गौतमस्वामी थे वहाँ आकर निवेदन करती है'प्रभो ! आप मेरे पीछे पधारें । मैं आपको मृगापुत्र दारक बताती हूँ।' गौतमस्वामी मृगादेवी के पीछे-पीछे चलने लगे । तत्पश्चात् वह मृगादेवी उस काष्ठ-शकट को खींचती-खींचती भूमिगृह आकर चार पड़ वाले वस्त्र से मुँह को बाँधकर भगवान गौतमस्वामी से निवेदन करने लगी-'हे भगवन् ! आप भी मुँह को बाँध लें ।' मृगादेवी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान गौतमस्वामी ने भी मुख-वस्त्रिका से मुख को बाँध लिया । तत्पश्चात् मृगादेवी ने पराङ्गख होकर जब उस भमिगह के दरवाजे को खोला उसमें से दुर्गन्ध नीकलने लगी । वह गन्ध मरे हए सर्प यावत उससे भी अधिक अनिष्ट थी। तदनन्तर उस महान अशन, पान, खादिम, स्वादिम के सुगन्ध से आकृष्ट व मूर्छित हुए उस मृगापुत्र ने मुख से आहार किया । शीघ्र ही वह नष्ट हो गया, वह आहार तत्काल पीव व रुधिर के रूप में परिवर्तित हो गया। मृगापुत्र दारक ने पीव व रुधिर रूप में परिवर्तित उस आहार का वमन कर दिया । वह बालक अपने ही द्वारा वमन किये हुए उस पीव व रुधिर को भी खा गया । मृगापुत्र दारक की ऐसी दशा को देखकर भगवान गौतमस्वामी के मन में ये विकल्प उत्पन्न हुए-अहो ! यह बालक पूर्वजन्मों के दुश्चीर्ण व दुष्प्रतिक्रान्त अशुभ पापकर्मों के पापरूप फल को पा रहा है । नरक व नारकी तो मैंने नहीं देखे, परन्तु यह मृगापुत्र सचमुच नारकीय वेदनाओं का अनुभव करता हुआ प्रतीत हो रहा है । इन्हीं विचारों से आक्रान्त होते हुए भगवान गौतम ने मृगादेवी से पूछकर कि अब मैं जा रहा हूँ, उसके घर से प्रस्थान किया । मृगाग्राम नगर के मध्यभाग से चलकर जहाँ श्रमण भगवान महावीर स्वामी बिराजमान थे; वहाँ पधारकर प्रदक्षिणा करके वन्दन तथा नमस्कार किया और इस प्रकार बोले-भगवन् ! आपश्री से आज्ञा प्राप्त करके मृगाग्राम नगर के मध्यभाग से चलता हुआ जहाँ मृगादेवी का घर था वहाँ में पहुँचा । मुझे आते हुए देखकर मृगादेवी हृष्ट तुष्ट हुई यावत् पीव व शोणित-रक्त का आहार करते हुए मृगापुत्र को देखकर मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ-अहह ! यह बालक पूर्वजन्मोपार्जित महापापकर्मों का फल भोगता हआ बीभत्स जीवन बिता रहा है। सूत्र- ७,८ भगवन् ! यह पुरुष मृगापुत्र पूर्वभव में कौन था ? किस नाम व गोत्र का था ? किस ग्राम अथवा नगर का रहने वाला था ? क्या देकर, क्या भोगकर, किन-किन कर्मों का आचरण कर और किन-किन पुराने कर्मों के फल को भोगता हुआ जीवन बिता रहा है ? श्रमण भगवान महावीर ने भगवान गौतम को कहा-'हे गौतम ! उस काल तथा उस समय में इस जम्बूद्वीप नामक द्वीप के अन्तर्गत भारतवर्ष में शतद्वार नामक एक समृद्धिशाली नगर था। उस नगर में धनपति नाम का एक राजा राज्य करता था । उस नगर से कुछ दूरी पर अग्निकोण में विजयवर्द्धमान नामक एक खेट नगर था जो ऋद्धि-समृद्धि आदि से परिपूर्ण था । उस विजयवर्द्धमान खेट का पाँच सौ ग्रामों का विस्तार था । उस खेट में इक्काई नाम का राष्ट्रकूट था, जो परम अधार्मिक यावत् दुष्प्रत्यानन्दी था । वह एकादि विजयवर्द्धमान खेट के पाँच सौ ग्रामों का आधिपत्य करता हुआ जीवन बिता रहा था। तदनन्तर वह एकादि नाम का प्रतिनिधि विजयवर्द्धमान खेट के पाँच सौ ग्रामों को करों-महसूलों से, करों की प्रचुरता से, किसानों को दिये धान्यादि के द्विगुण आदि के ग्रहण करने से, रिश्वत से, दमन से, अधिक ब्याज से, हत्यादि के अपराध लगा देने से, धन-ग्रहण के निमित्त किसी को स्थान आदि का प्रबन्धक बना देने से, चोर आदि व्यक्तियों के पोषण से, ग्रामादि को जलाने से, पथिकों को मार-पीट करने से, व्यथित-पीड़ित करता हुआ, धर्म से विमुख करता हुआ, कशादि से ताड़ित और सधनों को निर्धन करता हुआ प्रजा पर अधिकार जमा रहा था । तदनन्तर वह राजप्रतिनिधि एकादि विजयवर्द्धमान खेट के राजा-मांडलिक, ईश्वर, तलवर ऐसे नागरिक लोग, माडंबिक, कौटुम्बिक, श्रेष्ठी, सार्थनायक तथा अन्य अनेक ग्रामीण पुरुषों के कार्यों में, कारणों में, गुप्त मंत्रणाओं में, निश्चयों और विवादास्पद निर्णयों में सूनता हुआ भी कहता था कि ''मैंने नहीं सूना'' और नहीं सुनता हुआ मुनि दीपरत्नसागर कृत् “ (विपाकश्रुत) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 7
SR No.034678
Book TitleAgam 11 Vipak Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 11, & agam_vipakshrut
File Size2 MB
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