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________________ आगम सूत्र ११, अंगसूत्र-१, 'विपाकश्रुत' श्रुतस्कन्ध/अध्ययन/ सूत्रांक अध्ययन-७ - उंबरदत्त सूत्र-३१ उत्क्षेप पूर्ववत् । हे जम्बू ! उस काल तथा उस समय में पाटलिखंड नगर था । वहाँ वनखण्ड उद्यान था। उस उद्यान में उम्बरदत्त नामक यक्ष का यक्षायतन था । उस नगर में सिद्धार्थ राजा था । पाटलिखण्ड नगर में सागरदत्त नामक धनाढ्य सार्थवाह था । उसकी गङ्गदत्ता भार्या थी । उस सागरदत्त का पुत्र व गङ्गदत्ता भार्या का आत्मज उम्बरदत्त नाम अन्यून व परिपूर्ण पञ्चेन्द्रियों से युक्त सुन्दर शरीर वाला एक पुत्र था । उस काल और उस समय श्रमण भगवान महावीर वहाँ पधारे, यावत् धर्मोपदेश सूनकर राजा तथा परिषद् वापिस चले गए। उस काल तथा उस समय गौतम स्वामी के पारणे के निमित्त भिक्षा के लिए पाटलिखण्ड नगर में पूर्वदिशा के द्वार से प्रवेश करते हैं । वहाँ एक पुरुष को देखते हैं, वह पुरुष कण्डू, कोढ, जलोदर, भगन्दर तथा अर्श के रोग से ग्रस्त था । उसे खाँसी, श्वास व सूजन का रोग भी हो रहा था । उसका मुख, हाथ और पैर भी सूजे हुए थे । हाथ और पैर की अङ्गुलियाँ सड़ी हुई थीं, नाक और कान गले हुए थे । व्रणों से नीकलते सफेद गन्दे पानी तथा पीव से वह 'थिव थिव' शब्द कर रहा था । कृमियों से अत्यन्त ही पीड़ित तथा गिरते हुए पीव और रुधिरवाले व्रणमुखों से युक्त था । उसके कान और नाक फोडे के बहाव के तारों से गल चूके थे । वारंवार वह पीव, रुधिर, तथा कमियों के कवलों का वमन कर रहा था । वह कष्टोत्पादक, करुणाजनक एवं दीनतापूर्ण शब्द कर रहा था । उसके पीछे-पीछे मक्षिकाओं के झुण्ड के झुण्ड चले जा रहे थे । उसके सिर के बाल अस्तव्यस्त थे । उसने थिगलीवाले वस्त्रखंड धारण कर रखे थे । फूटे हुए घड़े का टुकड़ा उसका भिक्षापात्र था । सिकोरे का खंड उसका जल-पात्र था, जिसे वह हाथ में लिए हुए घर-घर में भिक्षावृत्ति के द्वारा आजीविका कर रहा था। इधर भगवान गौतम स्वामी ऊंच, नीच और मध्यम घरों में भिक्षार्थ भ्रमण करते हुए पाटलिखण्ड नगर से नीकलकर जहाँ श्रमण भगवान महावीर थे, वहाँ आकर भक्तपान की आलोचना की और आहार-पानी भगवान को दिखलाकर, उनकी आज्ञा मिल जाने पर बिल में प्रवेश करते हुए सर्प की भाँति आहार करते हैं और संयम तथा तप से अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरण करने लगे। उसके बाद भगवान गौतमस्वामी ने दूसरी बार बेले के पारणे के निमित्त प्रथम प्रहर में स्वाध्याय किया यावत् भिक्षार्थ गमन करते हुए पाटलिखण्ड नगर में दक्षिण उन्होंने कंडू आदि रोगों से युक्त उसी पुरुष को देखा और वे भिक्षा लेकर वापिस आए । यावत् तप व संयम से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे । तदनन्तर भगवान गौतम तीसरी बार बेले के पारणे के निमित्त उसी नगर में पश्चिम दिशा के द्वार से प्रवेश करते हैं, तो वहाँ पर भी वे उसी पूर्ववर्णित पुरुष को देखते हैं। इसी प्रकार गौतम चौथी बार बेले के पारणे के लिए पाटलिखण्ड में उत्तरदिशा के द्वार से प्रवेश करते हैं। तब भी उन्होंने उसी पुरुष को देखा । उसे देखकर मन में यह संकल्प हुआ कि-अहो ! यह पुरुष पूर्वकृत् अशुभ कर्मों के कटु-विपाक को भोगता हुआ दुःखपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है यावत् वापिस आकर उन्होंने भगवान से कहा-'भगवन् ! मैंने बेले के पारणे के निमित्त यावत् पाटलिखण्ड नगर की ओर प्रस्थान किया और नगर के पूर्व दिशा के द्वार से प्रवेश किया तो मैंने एक पुरुष को देखा जो कण्डूरोग से आक्रान्त यावत् भिक्षावृत्ति से आजीविका कर रहा था। फिर दूसरी बार, तीसरी बार, यावत् जब चौथी बार में बेले के पारण के निमित्त पाटलिखण्ड में उत्तर दिग्द्वार से प्रविष्ट हुआ तो वहाँ पर भी कंडूरोग से ग्रस्त भिक्षावृत्ति करते हुए उस पुरुष को देखा । उसे देखकर मेरे मानस में यह विचार उत्पन्न हुआ कि अहो ! यह पुरुष पूर्वोपार्जित अशुभ कर्मों का फल भुगत रहा है; इत्यादि । प्रभो ! यह पुरुष पूर्वभव में कौन था ? जो इस प्रकार भीषण रोगों से आक्रान्त हुआ कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है ? भगवान महावीर ने कहा हे गौतम ! उस काल और उस समय में इस जम्बूद्वीप के अन्तर्गत भारतवर्ष में विजयपुर नाम का ऋद्ध, स्तिमित व समृद्ध नगर था । उसमें कनकरथ राजा था । उस कनकरथ का धन्वन्तरि नाम का वैद्य था जो आयुर्वेद मुनि दीपरत्नसागर कृत् “ (विपाकश्रुत) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 30
SR No.034678
Book TitleAgam 11 Vipak Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 11, & agam_vipakshrut
File Size2 MB
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