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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र-६, 'ज्ञाताधर्मकथा' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक न पता चला । तब जहाँ धन्य सार्थवाह था, वहाँ पहुँचा । धन्य सार्थवाह से इस प्रकार कहने लगा-स्वामिन ! भद्रा सार्थवाही ने स्नान किए, बलिकर्म किये हए, कौतुक, मंगल, प्रायश्चित्त किये हुए और सभी अलंकारों से विभूषित बालक को मेरे हाथ में दिया था । तत्पश्चात् मैंने बालक देवदत्त को कमर में ले लिया । लेकर यावत् सब जगह उसकी ढूंढ-खोज की, परन्तु नहीं मालूम स्वामिन् ! की देवदत्त बालक को कोई मित्रादि अपने घर ले गया है, चोर ने उसका अपहरण कर लिया है अथवा किसी ने ललचा लिया है ? इस प्रकार धन्य सार्थवाह के पैरों में पड़कर उसने वृत्तान्त निवेदन किया । धन्य सार्थवाह पंथक दासचेटक की यह बात सूनकर, हृदयमें धारण करके महान् पुत्र-शोक से व्याकुल होकर, कुल्हाड़े से काटे हुए चम्पक वृक्ष की तरह पृथ्वी पर सब अंगों से धड़ाम से गिर पड़ा। तत्पश्चात् धन्य सार्थवाह थोड़ी देर बाद आश्वस्त हआ-होश में आया, उसके प्राण मानों वापिस लौटे, उसने देवदत्त बालक की सब ओर ढंढ-खोज की, मगर कहीं भी देवदत्त बालक का पता न चला, छींक आदि का शब्द भी न सून पड़ा और न समाचार मिला । तब वह अपने घर पर आया । आकर बहुमूल्य भेंट ली और जहाँ नगररक्षक-कोतवाल आदि थे, वहाँ पहँच कर वह बहमूल्य भेंट उनके सामने रखी और इस प्रकार कहा-हे देवानप्रिय ! मेरा पुत्र और भद्रा आर्या का आत्मज देवदत्त नामक बालक हमें इष्ट है, यावत उसका न करना भी दुर्लभ है तो फिर दर्शन का तो कहना ही क्या है ! धन्य सार्थवाह ने आगे कहा-भद्रा ने देवदत्त को स्नान करा कर और समस्त अलंकारों से विभूषित करके पंथक के हाथ में सौंप दिया । यावत् पंथक ने मेरे पैरों में गिरकर मुझसे निवेदन किया। तो हे देवानुप्रिय ! मैं चाहता हूँ कि आप देवदत्त बालक की सब जगह मार्गणा-गवेषणा करें। सूत्र - ५० तत्पश्चात् उन नगररक्षकों ने धन्य सार्थवाह के ऐसा कहने पर कवच तैयार किया, उसे कसों से बाँधा और शरीर पर धारण किया । धनुष रूपी पट्टिका पर प्रत्यंचा चढाई । आयध और प्रहरण ग्रहण किये । फिर धन्य सार्थवाह के साथ राजगृह नगर के बहुत-से नीकलने के मार्गों यावत् दरवों, पीछे खिड़कियों, छेड़ियों, किले की छोटी खिड़कियों, मोरियों, रास्ते मिलने की जगहों, रास्ते अलग-अलग होने के स्थानों, जुआ के अखाड़ों, मदिरापान के स्थानों, वेश्या के घरों, चोरों के घरों, शृंगाटकों त्रिक, चौकों, अनेक मार्ग मिलने के स्थानों, नागदेव के गृहों, भूतों के गृहों, यक्षगृहों, सभास्थानों, प्याऊओं आदि में तलाश करते-करते राजगृह नगर से बाहर नीकले । जहाँ जीर्ण उद्यान था और जहाँ भग्न कूप था, वहाँ आए । आकर उस कूप में निष्प्राण, निश्चेष्ट एवं निर्जीव देवदत्त का शरीर देखा, देखकर 'हाय, हाय' 'अहो अकार्य !' इस प्रकार कहकर उन्होंने देवदत्त कुमार को उस भग्न कूप से बाहर नीकाला और धन्य सार्थवाह के हाथों में सौंप दिया। तत्पश्चात् वे नगररक्षक विजय चोर के पैरों के निशानों का अनुसरण करते हुए मालुका-कच्छ में पहुँचे । उसके भीतर प्रविष्ट हुए । विजय चोर को पंचों की साक्षीपूर्वक, चोरी के माल के साथ, गर्दन में बांधा और जीवित पकड़ लिया । फिर अस्थि, मुष्टि से घुटनों, कोहनियों आदि पर प्रहार करके शरीर को भग्न और मथित कर दिया। उसकी गर्दन और दोनों हाथ, पीठ तरफ बांध दिए । फिर बालक देवदत्त के आभरण कब्जे किए । तत्पश्चात् विजय चोर को गर्दन से बांधा और मालुकाकच्छ से बाहर नीकले । राजगृह नगर आए । राजगृह नगर में प्रविष्ट हुए और नगर के त्रिक, चतुष्क, चत्वर एवं महापथ आदि मार्गों के कोड़ों के प्रहार, छड़ियों के प्रहार, छिव के प्रहार कर करते और उसके ऊपर राख धूल और कचरा डालते हुए तेज आवाज से घोषित करते हुए इस प्रकार कहने लगे 'हे देवानुप्रिय ! यह विजय नाम का चोर है । यह गीध समान मांसभक्षी, बालघातक है । हे देवानुप्रिय ! कोई राजा, राजपत्र अथवा राजा का अमात्य इसके लिए अपराधी नहीं है कोई निष्कारण ही इसे लिए अपराधी नहीं है कोई निष्कारण ही इसे दंड नहीं दे रहा है। इस विषय में इसके किए कुकर्म ही अपराधी हैं । इस प्रकार कहकर जहाँ चार कशाला थी, वहाँ पहुँचे, वहाँ पहुँच कर उसे बेड़ियों से जकड़ दिया । भोजन-पानी बंद कर दिया । तीनों संध्याकालों में चाबुकों, छड़ियों और कंबा आदि के प्रहार करने लगे । तत्पश्चात् धन्य सार्थवाह ने मित्र, ज्ञाति, निजक, स्वजन, संबंधी और परिवार के साथ रोते-रोते, आक्रंदन करते यावत् विलाप करते बालक देवदत्त के शरीर का महान् ऋद्धि सत्कार के समूल के मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 42
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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