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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र-६, 'ज्ञाताधर्मकथा' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक तत्पश्चात् नन्द मणिकार सेठ श्रेणिक राजा से आज्ञा प्राप्त करके हृष्ट-तुष्ट हुआ । वह राजगृह नगर के बीचों बीच होकर नीकला । वास्तुशास्त्र के पाठकों द्वारा पसंद किए हुए भूमिभाग में नन्दा नामक पुष्करिणी खुदवाने में प्रवृत्त हो गया-उसने पुष्करिणी का खनन कार्य आरम्भ करवा दिया । तत्पश्चात् नन्दा पुष्करिणी अनुक्रम से खुदती-खुदती चतुष्कोण और समान किनारों वाली पूरी पुष्करिणी हो गई । अनुक्रम से उसके चारों ओर घूमा हुआ परकोटा बन गया, उसका जल शीतल हुआ । जल पत्तों, बिसतंतुओं और मृणालों से आच्छादित हो गया । वह वापी बहुत-से खिले हुए उत्पल, पद्म, कुमुद, नलिनी, सुभग जातिय कमल, सौगंधिक कमल, पुण्डरीक महापु-ण्डरीक, शतपत्र कमल, सहस्रपत्र कमल की केसर से युक्त हुई । परिहत्थ नामक जल-जन्तुओं, भ्रमण करते हुए मदोन्मत्त भ्रमरों और अनेक पक्षियों के युगलों द्वारा किये हुए शब्दों से उन्नत और मधुर स्वर से वह पुष्करिणी गूंजने लगी । वह सबके मन को प्रसन्न करने वाली दर्शनीय, अभिरूप और प्रतिरूप हो गई । तत्पश्चात् नन्द मणिकार श्रेष्ठी ने नन्दा पुष्करिणी की चारों दिशाओं में चार वनखण्ड रूपवाये-लगवाए । उन वनखण्डों की क्रमशः अच्छी रखवाली की गई, संगोपन-सार-सँभाल की गई, अच्छी तरह उन्हें बढ़ाया गया, अत एव वे वनखण्ड कृष्ण वर्ण वाले तथा गुच्छा रूप हो गए-खूब घने हो गए । वे पत्तों वाले, पुष्पों वाले यावत् शोभायमान हो गए। तत्पश्चात् नन्द मणियार सेठ ने पूर्व दिशा के वनखण्ड में एक विशाल चित्रसभा बनवाई । वह कई सौ खम्भों की बनी हुई थी, प्रसन्नताजनक, दर्शनीय, अभिरूप और प्रतिरूप थी । उस चित्रसभा में बहुत-से कृष्ण वर्ण वाले यावत् शुक्ल वर्ण वाले काष्ठकर्म, पुस्तकर्म, चित्रकर्म, लेप्यकर्म-ग्रंथिक कर्म, वेष्टितकर्म, पूरिमकर्म और संघातिमकर्म थीं । वे कलाकृतियाँ इतनी सुन्दर थीं कि दर्शकगण उन्हें एक दूसरे को दिखा-दिखा कर वर्ण करते थे। उस चित्रसभा में बहुत-से आसन और शयन निरन्तर बिछे रहते थे । वहाँ बहुत-से नाटक करने वाले और नृत्य करने वाले, यावत् वेतन देकर रखे हुए थे । वे तालाचर कर्म किया करते थे । राजगृह से बाहर सैर के लिए नीकले हुए बहुत लोग उस जगह आकर पहले से ही बिछे हुए आसनों और शयनों पर बैठकर, लेटकर कथा-वार्ता सूनते थे और नाटक आदि देखते थे और वहाँ की शोभा अनुभव करते हुए सुखपूर्वक विचरण करते थे । नन्दी मणिकार सेठ ने दक्षिण तरफ के वनखण्ड में एक बड़ी महानसशाला बनवाई । वह भी अनेक सैकड़ों खम्भों वाली यावत् प्रतिरूप थी। वहाँ भी बहुत-से लोग जीविका, भोजन और वेतन देकर रखे गए थे। वे विपुल अशन, पान, खादिम और स्वादिम आहार पकाते थे और बहुत-से श्रमणों, ब्राह्मणों, अतिथियों, दरिद्रों और भिखारियों को देते रहते थे। नन्द मणिकार सेठ ने पश्चिम दिशा के वनखण्ड में एक विशाल चिकित्सा शाला बनवाई। वह भी अनेक सौ खम्भों वाली यावत मनोहर थी । उसमें बहत-से वैद्य, वैद्यपत्र, ज्ञायक, ज्ञायकपत्र, कुशल और कुशलपत्र आजीविका, भोजन और वेतन पर नियुक्त किये हुए थे । वे बहुत-से व्याधितों की, ग्लानों की, रोगियों की और दुर्बलों की चिकित्सा करते रहते थे । उस चिकित्साशाला में दूसरे भी बहुत-से लोग आजीविका, भोजन और वेतन देकर रखे गए थे । वे उन व्याधितों, रोगियों, ग्लानों और दुर्बलों की औषध भेषज भोजन और पानी से सेवा-शुश्रूषा करते थे । तत्पश्चात् नन्द मणियार सेठ ने उत्तर दिशा वनखण्ड में एक बड़ी अलंकारसभा बनवाई । वह भी अनेक सैकड़ों स्तंभों वाली यावत् मनोहर थी। उसमें बहुत-से आलंकारिक पुरुष जीविका, भोजन और वेतन देकर रखे गए थे । वे बहुत-से श्रमणों, अनाथों, ग्लानों, रोगियों और दुर्बलों का अलंकारकर्म करते थे । उस नन्दा पुष्करिणी में बहुत-से सनाथ, अनाथ, पथिक, पांथिक, करोटिका, घसियारे, पत्तों के भार वाले, लकड़हारे आदि आते थे । उनमें से कोई-कोई स्नान करते थे, पानी पीते थे और पानी भर ले जाते थे । कोई-कोई पसीने, जल्ल, मल, परिश्रम, निद्रा, क्षुधा और पीपासा का निवारण करके सुखपूर्वक करते थे । नन्दा पुष्करिणी में राजगृह नगर में भी नीकले-आये हुए बहुत-से लोग क्या करते थे ? वे लोग जल में रमण करते थे, विविध प्रकार से स्नान करते थे, कदलीगृहों, लतागृहों, पुष्पशय्या और अनेक पक्षियों के समूह के मनोहर शब्दों से युक्त नन्दा पुष्करिणी और चारों वनखण्डों में क्रीड़ा करते-करते विचरते थे। नन्दा पुष्करिणी में स्नान करते हुए, पानी पीते हुए और पानी भरकर ले जाते हुए बहुत-से लोग आपस में मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 103
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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