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आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-2'
शतक/वर्ग/उद्देशक/ सूत्रांक २३१ भंग होते हैं । गन्ध के सप्तप्रदेशी स्कन्ध के समान ६ भंग होते हैं । रस के इसी स्कन्ध के वर्ण के समान २३१ भंग होते हैं । स्पर्श के चतुःप्रदेशी स्कन्ध के ३६ भंग होते हैं।
भगवन् ! नवप्रदेशी स्कन्ध कितने वर्ण वाला होता है ? इत्यादि प्रश्न । गौतम ! अष्टप्रदेशी स्कन्ध के समान, कदाचित् एकवर्ण (से लेकर) कदाचित् चार स्पर्श वाला होता है; यदि वह एक वर्ण दो, दो वर्ण, तीन वर्ण अथवा चार वर्ण वाला हो तो उसके भंग अष्टप्रदेशी स्कन्ध के समान हैं । यदि वह पाँच वर्ण वाला होता है, तो कदाचित् एकदेश काला, एकदेश नीला, एकदेश लाल, एकदेश पीला और एकदेश श्वेत होता है, कदाचित् एकदेश काला, एकदेश नीला, एकदेश लाल, एकदेश पीला और अनेकदेश श्वेत होता है । इस प्रकार कदाचित् अनेकदेश काला, अनेकदेश नीला, अनेकदेश लाल, अनेकदेश पीला और एकदेश श्वेत होता है, यहाँ तक इकतीस भंग कहना । यों वर्ण की अपेक्षा-सब मिलाकर २३६ भंग होते हैं । गन्ध-विषयक ६ भंग अष्टप्रदेशी के समान होते हैं । रस-विषयक २३६ भंग कहना । स्पर्श के ३६ भंग चतुःप्रदेशी के समान समझना।।
भगवन् ! दशप्रदेशी स्कन्ध संबंधी प्रश्न । गौतम ! नव-प्रदेशिक स्कन्ध के समान कहना । यदि एकवर्णादि वाला हो तो नव-प्रदेशिक स्कन्ध के एक वर्ण, दो वर्ण, तीन वर्ण और चार वर्ण के समान । यदि वह पाँच वर्ण वाला हो तो नवप्रदेशी के समान समझना । विशेष यह है कि यहाँ अनेकदेश काला, अनेकदेश नीला, अनेकदेश पीला और अनेकप्रदेश श्वेत होता है । यह बत्तीसवा भंग अधिक कहना । इस प्रकार वर्ण के २३७ भंग होते हैं । गन्ध के ६ भंग नवप्रदेशी के समान । रस के २३७ भंग वर्ण के समान हैं । स्पर्शसम्बन्धी ३६ भंग चतुःप्रदेशी के समान हैं।
दशप्रदेशी स्कन्ध के समान संख्यातप्रदेशी स्कन्ध (के) भी (वर्णादि सम्बन्धी भंग कहने चाहिए)। इसी प्रकार असंख्यातप्रदेशी स्कन्ध के विषय में भी समझना चाहिए । सूक्ष्मपरिणाम वाले अनन्तप्रदेशी स्कन्ध के विषय में भी इसी प्रकार भंग कहने चाहिए। सूत्र-७८७
भगवन् ! बादर-परिणाम वाला अनन्तप्रदेशी स्कन्ध कितने वर्ण वाला होता है ? गौतम ! अठारहवे शतक के छठे उद्देशक के समान कदाचित् आठ स्पर्श वाला कहा गया है, तक जानना । अनन्तप्रदेशी बादर परिणामी स्कन्ध के वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श के भंग, दशप्रदेशी स्कन्ध के समान कहने । यदि वह चार स्पर्श वाला होता है, तो कदाचित् सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वशीत और सर्वस्निग्ध होता है, कदाचित् सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वशीत और सर्वरूक्ष होता है, कदाचित् सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वउष्ण और सर्वस्निग्ध होता है, कदाचित सर्वगरु, सर्वउष्ण और सर्वरूक्ष होता है । कदाचित् सर्वकर्कश, सर्वलघु, सर्वशीत और सर्वस्निग्ध होता है । कदाचित् सर्वकर्कश, सर्वलघु, सर्वशीत
और सर्वरूक्ष होता है । कदाचित् सर्वकर्कश, सर्वलघु, सर्वउष्ण और सर्वस्निग्ध होता है । कदाचित् सर्व-कर्कश, सर्वलघु, सर्वउष्ण और सर्वरूक्ष होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वगुरु, सर्वशीत और सर्वस्निग्ध होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वगुरु, सर्वभीत और सर्वरूक्ष होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वगुरु, सर्वउष्ण और सर्वस्निग्ध होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वगुरु, सर्वउष्ण और सर्वरूक्ष होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वलघु, सर्वशीत और सर्वस्निग्ध होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वलघु, सर्वशीत और सर्वरूक्ष होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वलघु, सर्व-उष्ण और सर्वस्निग्ध होता है । कदाचित् सर्वमृदु, सर्वलघु, सर्वउष्ण और सर्वरूक्ष होता है । इस प्रकार सोलह भंग हैं।
यदि पाँच स्पर्श वाला होता है, तो सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वशीत, एकदेश स्निग्ध और एकदेश रूक्ष होता है। अथवा सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वशीत, एकदेश स्निग्ध और अनेकदेश रूक्ष होता है । अथवा सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वशीत, एकदेश स्निग्ध और अनेकदेश रूक्ष होता है। अथवा सर्वकर्कश, सर्वगरु, सर्वशीत, अनेकदेश स्निग्ध और एकदेश रूक्ष होता है । अथवा सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वशीत, अनेकदेश स्निग्ध और अनेकदेश रूक्ष होता है । अथवा सर्वकर्कश, सर्वगुरु, सर्वउष्ण, एकदेश स्निग्ध और एकदेश रूक्ष होता है, इनके चार भंग । कदाचित् सर्व-कर्कश, सर्वलघु, सर्वशीत, एकदेश स्निग्ध और एकदेश रूक्ष होते हैं, इनके भी चार भंग | अथवा कदाचित् सर्व-कर्कश, सर्वलघु, सर्वउष्ण, एकदेश स्निग्ध और एकदेश रूक्ष इसके भी पूर्ववत् चार भंग । इस प्रकार कर्कश के साथ सोलह
मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती-२) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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