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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-1' शतक/ शतकशतक/उद्देशक/ सूत्रांक उस तिगिच्छकूट नामक उत्पातपर्वत का ऊपरी भू-भाग बहुत ही सम एवं रमणीय है । उस अत्यन्त सम एवं रमणीय ऊपरी भूमिभाग के ठीक बीचोबीच एक महान प्रासादावतंसक है । उसकी ऊंचाई २५० योजन है और उसका विष्कम्भ १२५ योजन है । आठ योजन की मणिपीठिका है । (यहाँ चमरेन्द्र के सिंहासन का वर्णन करना चाहिए ।) उस तिगिच्छकट के दक्षिण की ओर अरुणोदय समद्र में छह सौ पचपन करोड पैंतीस लाख, पचास हजार योजन तीरछा जाने के बाद नीचे रत्नप्रभापृथ्वी का ४० हजार योजन भाग अवगाहन करने के पश्चात् यहाँ असुरकुमारों के इन्द्र-राजा चमर की चमरचंचा नामकी राजधानी है । उस राजधानी का आयाम और विष्कम्भ एक लाख योजन है । वह राजधानी जम्बूद्वीप जितनी है । उसका प्राकार १५० योजन ऊंचा है। उसके मूल का विष्कम्भ ५० योजन है। उसके ऊपरी भाग का विष्कम्भ साढ़े तेरह योजन है। उसके कंगूरों की लम्बाई आधा योजन और विष्कम्भ एक कोस है। कपिशीर्षकों की ऊंचाई आधे योजन से कुछ कम है। उसकी एक-एक भूजा में पाँच-पाँच सौ दरवाजे हैं। उसकी ऊंचाई २५० योजन है । ऊपरी तल का आयाम और विष्कम्भ सोलह हजार योजन है । उसका परिक्षेप ५०५९७ योजन से कुछ विशेषोन है । यहाँ समग्र प्रमाण वैमानिक के प्रमाण से आधा समझना चाहिए । उत्तर पूर्व में सुधर्मासभा, जिनगृह, उसके पश्चात् उपपातसभा, हृद, अभिषेक सभा और अलंकारसभा; यह सारा वर्णन विजय की तरह कहना चाहिए । उपपात, संकल्प, अभिषेक, विभूषणा, व्यवसाय, अर्चनिका और सिद्धायतन-सम्बन्धी गम, तथा चमरेन्द्र का परिवार और उसकी ऋद्धिसम्पन्नता; आदि का वर्णन समझ लेना। शतक-२ - उद्देशक-९ सूत्र - १४१ भगवन् ! यह समयक्षेत्र किसे कहा जाता है ? गौतम ! अढ़ाई द्वीप और दो समुद्र इतना यह (प्रदेश) समयक्षेत्र कहलाता है । इनमें जम्बूद्वीप नामक द्वीप समस्त द्वीपों और समुद्रों के बीचोबीच है । इस प्रकार जीवाभिगम सूत्र में कहा हुआ सारा वर्णन यहाँ यावत् आभ्यन्तर पुष्करार्द्ध तक कहना चाहिए; किन्तु ज्योतिष्कों का वर्णन छोड़ देना चाहिए। शतक-२- उद्देशक-१० सूत्र-१४२ भगवन ! अस्तिकाय कितने कहे गए हैं ? गौतम ! पाँच हैं। धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय और पुद्गलास्तिकाय। भगवन् ! धर्मास्तिकाय में कितने वर्ण, कितने गन्ध, कितने रस और कितने स्पर्श हैं ? गौतम ! धर्मास्ति-काय वर्णरहित, गन्धरहित, रसरहित और स्पर्शरहित है, अर्थात्-धर्मास्तिकाय अरूपी है, अजीव है, शाश्वत है, अवस्थित लोक (प्रमाण) द्रव्य है । संक्षेप में, धर्मास्तिकाय पाँच प्रकार का कहा गया है-द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से, भाव से और गुण से | धर्मास्तिकाय द्रव्य से एक द्रव्य है, क्षेत्र से लोकप्रमाण है; काल की अपेक्षा कभी नहीं था, ऐसा नहीं; कभी नहीं है, ऐसा नहीं; और कभी नहीं रहेगा, ऐसा भी नहीं; किन्तु वह था, है और रहेगा, यावत् वह नित्य है । भाव की अपेक्षा वर्णरहित, गन्धरहित, रसरहित और स्पर्शरहित है । गुण की अपेक्षा धर्मास्तिकाय गति-गुणवाला है। जिस तरह धर्मास्तिकाय का कथन किया गया है, उसी तरह अधर्मास्तिकाय के विषय में भी कहना । विशेष यह कि अधर्मास्तिकाय गुण की अपेक्षा स्थितिगुण वाला है। ___आकाशास्तिकाय के विषय में भी इसी प्रकार कहना चाहिए, किन्तु इतना अन्तर है कि क्षेत्र की अपेक्षा आकाशास्तिकाय लोकालोक-प्रमाण है और गुण की अपेक्षा अवगाहना गुण वाला है। भगवन् ! जीवास्तिकाय में कितने वर्ण, कितने गन्ध, कितने रस और कितने स्पर्श हैं ? गौतम ! जीवास्तिकाय वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शरहित है वह अरूपी है, जीव है, शाश्वत है, अवस्थित लोकद्रव्य है । संक्षेप में, जीवास्ति-काय के पाँच प्रकार कहे गए हैं । वह इस प्रकार-द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और गुण की अपेक्षा जीवास्तिकाय । द्रव्य की अपेक्षा-जीवास्तिकाय अनन्त जीवद्रव्यरूप है । क्षेत्र की अपेक्षा-लोक-प्रमाण है । काल की अपेक्षा-वह कभी नहीं मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 54
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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