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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-1' शतक/ शतकशतक/उद्देशक/सूत्रांक शतक-१ - उद्देशक-४ सूत्र -४६ भगवन् ! कर्म-प्रकृतियाँ कितनी कही है ? गौतम ! आठ । यहाँ कर्मप्रकृति नामक तेईसवें पद का (यावत्) अनुभाग तक सम्पूर्ण जान लेना। सूत्र -४७ कितनी कर्मप्रकृतियाँ हैं ? जीव किस प्रकार कर्म बाँधता है ? कितने स्थानों से कर्मप्रकृतियों को बाँधता है? कितनी प्रकृतियों का वेदन करता है ? किस प्रकृति का कितने प्रकार का अनुभाग (रस) है? सूत्र-४८ भगवन् ! कृतमोहनीय कर्म जब उदीर्ण हो, तब जीव उपस्थान-परलोक की क्रिया के लिए उद्यम करता है? हाँ, गौतम ! करता है। भगवन् ! क्या जीव वीर्यता-सवीर्य होकर उपस्थान करता है या अवीर्यता से ? गौतम ! जीव वीर्यता से उपस्थान करता है, अवीर्यता से नहीं करता । भगवन् ! यदि जीव वीर्यता से उपस्थान करता है, तो क्या बालवीर्य से करता है, अथवा पण्डितवीर्य से या बाल-पण्डितवीर्य से करता है ? गौतम ! वह बालवीर्य से उप-स्थान करता है, किन्तु पण्डितवीर्य से या बालपण्डितवीर्य से उपस्थान नहीं करता । भगवन् ! कृतमोहनीय कर्म जब उदय में आया हो, तब क्या जीव अपक्रमण करता है; हाँ, गौतम ! करता है । भगवन् ! वह बालवीर्य से अपक्रमण करता है, अथवा पण्डितवीर्य से या बाल-पण्डितवीर्यसे ? गौतम ! वह बालवीर्य से अपक्रमण करता है, पण्डितवीर्य से नहीं करता; कदाचित् बालपण्डितवीर्य से अपक्रमण करता है। जैसे उदीर्ण पद के साथ दो आलापक कहे गए हैं, वैसे ही उपशान्त पद के साथ दो आलापक कहने चाहिए। विशेषता यह है कि यहाँ जीव पण्डितवीर्य से उपस्थान करता है और अपक्रमण करता है-बालपण्डित वीर्य से । भगवन् ! क्या जीव आत्मा (स्व) से अपक्रमण करता है अथवा अनात्मा (पर) से करता है ? गौतम ! आत्मा से अपक्रमण करता है, अनात्मा से नहीं करता । भगवन् ! मोहनीय कर्म को वेदता हुआ यह (जीव) क्यों अपक्रमण करता है ? गौतम ! पहले उसे इस प्रकार (जिनेन्द्र द्वारा कथित तत्त्व) रुचता है और अब उसे इस प्रकार नहीं रुचता; इस कारण यह अपक्रमण करता है। सूत्र -४९ भगवन् ! नारक तिर्यंचयोनिक, मनुष्य या देव ने जो पापकर्म किये हैं, उन्हें भोगे बिना क्या मोक्ष नहीं होता? हाँ, गौतम ! नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देव ने जो पापकर्म किये हैं, उन्हें भोगे बिना मोक्ष नहीं होता । भगवन् ! ऐसा आप किस कारण से कहते हैं ? गौतम ! मैंने कर्म के दो भेद बताए हैं । प्रदेशकर्म और अनुभाग-कर्म । इनमें जो प्रदेशकर्म है, वह अवश्य भोगना पड़ता है, और इनमें जो अनुभागकर्म है, वह कुछ वेदा जाता है, कुछ नहीं वेदा जाता । यह बात अर्हन्त द्वारा ज्ञात है, स्मृत है, और विज्ञात है कि यह जीव इस कर्म को आभ्युप-गमिक वेदना से वेदेगा और वह जीव इस कर्म को औपक्रमिक वेदना से वेदेगा । बाँधे हुए कर्मों के अनुसार, निकरणों के अनुसार जैसा-तैसा भगवान ने देखा है, वैसा-वैसा वह विपरिणाम पाएगा । गौतम ! इस कारण से मैं ऐसा कहता हूँ कि-यावत् किये हुए कर्मों को भोगे बिना नारक, तिर्यंच, मनुष्य या देव का मोक्ष नहीं है। सूत्र- ५० भगवन् ! क्या यह पुद्गल-परमाणु अतीत, अनन्त, शाश्वत काल में था-ऐसा कहा जा सकता है ? हाँ, गौतम! यह पुद्गल अतीत, अनन्त, शाश्वतकाल में था, ऐसा कहा जा सकता है । भगवन् ! क्या यह पुद्गल वर्तमान शाश्वत है ऐसा कहा जा सकता है? हाँ, गौतम ! ऐसा कहा जा सकता है । हे भगवन् ! क्या यह पुद्गल अनन्त और शाश्वत भविष्यकाल में रहेगा, ऐसा कहा जा सकता है ? हाँ, गौतम ! कहा जा सकता है। इसी प्रकार के स्कन्ध के साथ भी तीन आलापक कहने चाहिए। इसी प्रकार जीव के साथ भी तीन आलापक कहने चाहिए। मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 19
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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