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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-1' शतक/ शतकशतक/उद्देशक/ सूत्रांक सर्वार्थसिद्ध-अनुत्तरौपपातिक-कल्पातीत वैमानिकदेव-पंचेन्द्रियकार्मणशरीर-कायमिश्रपरिणत होता है तक कहना । भगवन् ! यदि एक द्रव्य विस्रसा (से) परिणत होता है, तो क्या वह वर्णपरिणत होता है, गन्धपरिणत होता है, रसपरिणत होता है, स्पर्शपरिणत होता है, अथवा संस्थानपरिणत होता है ? गौतम ! वह वर्णपरिणत होता है, अथवा यावत् संस्थानपरिणत होता है । भगवन् ! यदि एक द्रव्य वर्णपरिणत होता है तो क्या वह कृष्णवर्ण के रूप में परिणत होता है, अथवा यावत् शुक्लवर्ण के रूप में है ? गौतम ! वह कृष्ण वर्ण के रूप में भी परिणत होता है, यावत् शुक्लवर्ण के रूप में । भगवन् ! यदि एक द्रव्य गन्धपरिणत होता है तो वह सुरभिगन्ध रूप में परिणत होता है, अथवा दुरभिगन्ध रूप में ? गौतम ! वह सुरभिगन्धरूप में भी परिणत होता है, अथवा दुरभिगन्धरूप में भी । भगवन् ! यदि एक द्रव्य रसरूप में परिणत होता है, तो क्या वह तीखे रस के रूप में परिणत होता है, अथवा यावत् मधुररस के रूप में । गौतम वह तीखे रस के रूप में भी परिणत होता है, अथवा यावत् मधुररस के रूप में भी । भगवन् ! यदि एक द्रव्य स्पर्शपरिणत होता है तो क्या वह कर्कशस्पर्शरूप से परिणत होता है, अथवा यावत रूक्षस्पर्शरूप में ? गौतम ! वह कर्कशस्पर्शरूप में भी परिणत होता है, अथवा यावत् रूक्षस्पर्शरूप में भी। भगवन् यदि एक द्रव्य संस्थान-परिणत होता है, तो क्या वह परिमण्डल-संस्थानरूप में परिणत होता है, अथवा यावत् आयत-संस्थानरूप में । गौतम ! वह द्रव्य परिमण्डल-संस्थानरूप में भी परिणत होता है, अथवा यावत् आयत-संस्थानरूप में भी। सूत्र - ३८७ भगवन! दो द्रव्य क्या प्रयोगपरिणत होते हैं. मिश्रपरिणत होते हैं. अथवा विस्रसापरिणत होते हैं ? गौतम! वे प्रयोगपरिणत होते हैं, या मिश्रपरिणत होते हैं, अथवा विस्रसापरिणत होते हैं, अथवा एक द्रव्यप्रयोगपरिणत होते हैं और दूसरा मिश्रपरिणत होता है; या एक द्रव्यप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा द्रव्य विस्रसापरिणत होता है, अथवा एक द्रव्य मिश्रपरिणत होता है और दूसरा विस्रसापरिणत होता है । इस प्रकार छह भंग होते हैं । यदि वे दो द्रव्य प्रयोगपरिणत होते हैं, तो क्या मनःप्रयोगपरिणत होते हैं, या वचनप्रयोगपरिणत होते हैं अथवा कायप्रयोग-परिणत होते हैं ? गौतम ! वे (दो द्रव्य) या तो मनःप्रयोगपरिणत होते हैं, या वचनप्रयोग-परिणत होते हैं, अथवा कायप्रयोगपरिणत होते हैं, अथवा उनमें से एक द्रव्यमनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा वचनप्रयोगपरिणत होता है, अथवा एक द्रव्य मनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा कायप्रयोगपरिणत होता है या एक द्रव्य वचनप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा कायप्रयोगपरिणत होता है। भगवन् ! यदि वे (दो द्रव्य) मनःप्रयोगपरिणत होते हैं, तो क्या सत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं, या असत्य-मनःप्रयोगपरिणत होते हैं, अथवा सत्यमृषामनःप्रयोग-परिणत होते हैं, या असत्यामृषा-मनःप्रयोगपरिणत होते हैं ? गौतम ! वे (दो द्रव्य) सत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं, यावत् असत्या मृषामनःप्रयोगपरिणत होते हैं; या उनमें से एक द्रव्य सत्यमनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा मृषामनःप्रयोगपरिणत होता है, अथवा एक द्रव्य सत्यमनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा सत्यमषामनःप्रयोगपरिणत होता है, या एक द्रव्य सत्यमनःप्रयोग-परिणत होता है और दूसरा असत्यामृषामनः-प्रयोगपरिणत होता है; अथवा एक द्रव्य मृषामनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा सत्यमृषामनःप्रयोगपरिणत होता है, या एक द्रव्य मृषामनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा असत्यामृषामनःप्रयोगपरिणत होता है अथवा एक द्रव्य सत्यमृषामनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा असत्यामृषामनःप्रयोगपरिणत होता है । भगवन् ! यदि वे सत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं तो क्या वे आरम्भसत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं या यावत् असमारम्भसत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं ? गौतम ! वे द्रव्य आरम्भसत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं, अथवा यावत् असमारम्भसत्यमनःप्रयोगपरिणत होते हैं; अथवा एक द्रव्य आरम्भसत्यमनःप्रयोगपरिणत होता है और दूसरा अनारम्भसत्य-मनःप्रयोगपरिणत होता है; इसी प्रकार इस पाठ के अनुसार द्विकसंयोगी भंग करना । जहाँ जितने भी द्विकसंयोग हो सकें, उतने सभी वहाँ सर्वार्थसिद्धवैमानिक पर्यन्त कहना। भगवन् ! यदि वे (दो द्रव्य) मिश्रपरिणत होते हैं तो मनोमिश्रपरिणत होते हैं ? प्रयोगपरिणत के अनुसार मिश्रपरिणत के सम्बन्ध में भी कहना । भगवन् ! यदि दो द्रव्य विस्रसा-परिणत होते हैं, तो क्या वे वर्णरूप से परिणत होते हैं, गंधरूप से परिणत होते हैं, (अथवा यावत् संस्थानरूप से परिणत होते हैं ?) गौतम ! जिस प्रकार पहले कहा मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 156
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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