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________________ आगम सूत्र ४, अंगसूत्र-४, 'समवाय' समवाय/ सूत्रांक समवाय-२५ सूत्र-५५ प्रथम और अन्तिम तीर्थंकरों के (द्वारा उपदिष्ट) पंचयाम की पच्चीस भावनाएं कही गई हैं । जैसे-(प्राणातिपात-विरमण महाव्रत की पाँच भावनाएं-) १. ईर्यासमिति, २. मनोगुप्ति, ३. वचनगुप्ति, ४. आलोकितपानभोजन, ५. आदानभांड-मात्रनिक्षेपणासमिति । (मृषावाद-विरमण महाव्रत की पाँच भावनाएं-) १. अनुवीचिभाषण २. क्रोध-विवेक, ३.लोभ-विवेक, ४.भयविवेक, ५.हास्य-विवेका(अदत्तादान-विरमण महाव्रत की पाँच भावनाएं -) -अनुज्ञापनता, २.अवग्रहसीम-ज्ञापनता, ३.स्वयमेव अवग्रह-अनुग्रहणता, ४.साधर्मिक अवग्रह-अनुज्ञापनता, ५.साधारण भक्तपान-अनुज्ञाप्य परि जनता । (मैथुन-विरमण महाव्रत की पाँच भावनाएं-) १.स्त्री-पशुनपुंसक-संसक्त शयन-आसन वर्जनता, २.स्त्रीकथाविवर्जनता, ३.स्त्री इन्द्रिय-आलोकनवर्जनता, ४.पूर्वरत-पूर्व क्रीड़ा-अननुस्मरणता, ५.प्रणीत-आहारविवर्जनता।(परिग्रह-विरमण महाव्रत की पाँच भावनाएं) १. श्रोत्रेन्द्रियरागोपरति, २.चक्षुरिन्द्रिय-रागोपरति, ३.घ्राणेन्द्रिय-रागोपरति, ४.जिह्वेन्द्रिय-रागोपरति ५. स्पर्शनेन्द्रिय -रागोपरति । मल्ली अर्हन् पच्चीस धनुष ऊंचे थे । सभी दीर्घ वैताढ्य पर्वत पच्चीस धनुष ऊंचे कहे गए हैं । तथा वे पच्चीस कोश भूमि में गहरे कहे गए हैं । दूसरी पृथ्वी में पच्चीस लाख नारकावास कहे गए हैं। चूलिका-सहित भगवद्-आचाराङ्ग सूत्र के पच्चीस अध्ययन कहे गए हैं । जैसेसूत्र- ५६-५८ १. शस्त्रपरिज्ञा, २. लोकविजय, ३. शीतोष्णीय, ४. सम्यक्त्व, ५. आवन्ती, ६. धृत, ७. विमोह, ८. उपधान श्रुत, ९. महापरिज्ञा । १०. पिण्डैषणा, ११. शय्या, १२. ईर्या, १३. भाषाध्ययन, १४. वस्त्रैषणा, १५. पात्रैषणा, १६. अवग्रहप्रतिमा १७. स्थान, १८. निषीधिका, १९. उच्चारप्रस्रवण, २०. शब्द, २१. रूप, २२. परक्रिया, २३. अन्योन्य क्रिया, २४. भावना अध्ययन और २५. विमुक्ति अध्ययन । अन्तिम विमुक्ति अध्ययन निशीथ अध्ययन सहित पच्चीसवाँ है। सूत्र-५९ संक्लिष्ट परिणाम वाले अपर्याप्तक मिथ्यादष्टि विकलेन्द्रिय जीव नामकर्म की पच्चीस उत्तर प्रकृतियों को बाँधते हैं | जैसे-तिर्यग्गतिनाम, विकलेन्द्रिय जातिनाम, औदारिकशरीरनाम, तैजसशरीरनाम, कार्मणशरीरनाम, हुंडकसंस्थान नाम, औदारिकसाङ्गोपाङ्ग नाम, सेवार्त्तसंहनन नाम, वर्णनाम, गन्धनाम, रसनाम, स्पर्शनाम, तिर्यंचानुपूर्वीनाम, अगुरुलघुनाम, उपघातनाम, त्रसनाम, बादरनाम, अपर्याप्तकनाम, प्रत्येकशरीरनाम, अस्थिरनाम, अशुभ नाम, दुर्भगनाम, अनादेयनाम, अयशस्कीर्त्ति नाम और निर्माणनाम । गंगा-सिन्धु महानदियाँ पच्चीस कोश पृथुल (मोटी) घड़े के मुख-समान मुख में प्रवेश कर और मकर के मुख की जिह्वा के समान पनाले से नीकल कर मुक्तावली हार के आकार से प्रपातद्रह में गिरती है । इसी प्रकार रक्ता-रक्तवती महानदियाँ भी पच्चीस कोश पृथुल घड़े के मुख समान मुख में प्रवेश कर और मकर के मख की जिह्वा के समान पनाले से नीकलकर मुक्तावली-हार के आकार से प्रपातद्रह में गिरती हैं। लोकबिन्दुसार नामक चौदहवें पूर्व के वस्तुनामक पच्चीस अर्थाधिकार कहे गए हैं। इस रत्नप्रभापृथ्वी में कितनेक नारकियों की स्थिति पच्चीस पल्योपम कही गई है । अधस्तन सातवी महातमः प्रभापृथ्वी में कितनेक नारकों की स्थिति पच्चीस सागरोपम कही गई है। कितनेक असुरकुमार देवों की स्थिति पच्चीस पल्योपम कही गई है। सौधर्म-ईशान कल्पमें कितनेक देवों की स्थिति २५ पल्योपम है । मध्यम-अधस्तनौवेयक देवों की जघन्य स्थिति २५ सागरोपम है । जो देव अधस्तन-उपरिमग्रैवेयक विमानों में देवरूप से उत्पन्न होते हैं उन देवों की उत्कृष्ट स्थिति पच्चीस सागरोपम है । वे देव साढे बारह मासों के बाद आन-प्राण या श्वासोच्छवास लेते है पच्चीस हजार वर्षों के बाद आहार की ईच्छा उत्पन्न होती है ।कितनेक भवसिद्धिक जीव ऐसे हैं जो पच्चीस भव ग्रहण करके सिद्ध होंगे, बुद्ध होंगे, कर्मों से मुक्त होंगे, परम निर्वाण को प्राप्त होंगे और सर्व दुःखों का अन्त करेंगे समवाय-२५ का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण मुनि दीपरत्नसागर कृत् (समवाय) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 31
SR No.034670
Book TitleAgam 04 Samvayang Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages96
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 04, & agam_samvayang
File Size3 MB
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