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________________ आगम सूत्र ३, अंगसूत्र-३, 'स्थान' स्थान/उद्देश/सूत्रांक बादर वनस्पतिकाय की उत्कृष्ट स्थिति दस हजार वर्ष की है। वाणव्यन्तर देवों की जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष की है। ब्रह्मलोककल्प में देवों की उत्कृष्ट स्थिति दस सागरोपम की है । लातककल्प में देवों की जघन्य स्थिति दश सागरोपम की है। सूत्र- ९७८ दस कारणों से जीव आगामी भव में भद्रकारक कर्म करता है । यथा-अनिदानता-धर्माचरण के फल की अभिलाषा न करना । दृष्टिसंपन्नता-सम्यग्दृष्टि होना । योगवाहिता-तप का अनुष्ठान करना । क्षमा-क्षमा धारण करना जितेन्द्रियता-इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना । अमायिता-कपट रहित होना । अपार्श्वस्थता-शिथिलाचारी न होना । सुश्रामण्यता-सुसाधुता । प्रवचनवात्सल्य-द्वादशाङ्ग अथवा संघ का हित करना । प्रवचनोद्भावना-प्रवचन की प्रभावना करना। सूत्र- ९७९ आशंसा प्रयोग दश प्रकार के हैं, यथा-इहलोक आशंसा प्रयोग-मैं अपने तप के प्रभाव से चक्रवर्ती आदि होऊं । परलोक आशंसा प्रयोग-मैं अपने तप के प्रभाव से इन्द्र अथवा सामान्य देव बनूँ, उभयलोक आशंसा प्रयोग-मैं अपने तप के प्रभाव से इस भव में चक्रवर्ती बनूँ और परभव में इन्द्र बनूँ । जीवित आशंसा प्रयोग-मैं चिरकाल तक जीवू, मरण आशंसा प्रयोग-मेरी मृत्यु शीघ्र हो, काम आशंसा प्रयोग-मनोज्ञ शब्द आदि मुझे प्राप्त हों, भोग आशंसा प्रयोग-मनोज्ञ गंध आदि मुझे प्राप्त हो, लाभ आशंसा प्रयोग-कीर्ति आदि प्राप्त हो, पूजा आशंसा प्रयोग-पुष्पादि से मेरी पूजा हो, सत् आशंसा प्रयोग-श्रेष्ठ वस्त्रादि से मेरा सत्कार हो । सूत्र - ९८० धर्म दश प्रकार के हैं, यथा-ग्राम धर्म, नगर धर्म, राष्ट्र धर्म, पाषंड धर्म, कुल धर्म, गण धर्म, संघ धर्म, श्रुत धर्म, चारित्र धर्म, अस्तिकाय धर्म । सूत्र- ९८१ स्थविर दश प्रकार के हैं, ग्रामस्थविर, नगरस्थविर, राष्ट्रस्थविर, प्रशास्तृ स्थविर, कुलस्थविर, गणस्थविर, संघस्थविर, जातिस्थविर, श्रुतस्थविर, पर्याय स्थविर । सूत्र- ९८२ पुत्र दश प्रकार के हैं, यथा-आत्मज-पिता से उत्पन्न, क्षेत्रज-माता से उत्पन्न किन्तु पिता के वीर्य से उत्पन्न न होकर अन्य पुरुष के वीर्य से उत्पन्न, दत्तक-गोद लिया हुआ पुत्र, विनयित शिष्य-पढ़ाया हुआ, ओरस-जिस पर पुत्र जैसा स्नेह हो, मौखर-किसी को प्रसन्न रखने के लिए अपने आपको पुत्र कहने वाला, शौंडीर-जो शौर्य से किसी शूर पुरुष के पुत्र रूप में स्वीकार किया जाए, संवर्धित-जो पाल पोष कर बड़ा किया जाए, औपयाचितक-देवता की आराधना से उत्पन्न पुत्र, धर्मान्तेवासी-धर्माराधना के लिए समीप रहने वाला। सूत्र - ९८३ केवली के दश उत्कृष्ट हैं, यथा-उत्कृष्ट ज्ञान, उत्कृष्ट दर्शन, उत्कृष्ट चारित्र, उत्कृष्ट तप, उत्कृष्ट वीर्य, उत्कृष्ट क्षमा, उत्कृष्ट निर्लोभता, उत्कृष्ट सरलता, उत्कृष्ट कोमलता और उत्कृष्ट लघुता । सूत्र-९८३ समय क्षेत्र में दश कुरुक्षेत्र हैं, यथा-पाँच देव कुरु, पाँच उत्तर कुरु । इन दश कुरुक्षेत्रों में दश महावृक्ष हैं । यथा-जम्बू सुदर्शन, घातकी वृक्ष, महाघातकी वृक्ष, पद्मवृक्ष, महापद्म वृक्ष, पाँच कूटशाल्मली वृक्ष । इन दश कुरुक्षेत्रों में दश महर्द्धिक देव रहते हैं, यथा-१. जम्बूद्वीप का अधिपति देव अनाहत, २. सुदर्शन, ३. प्रियदर्शन, ४. पौंडरिक, ५. महापौंडरिक, ६-१०. पाँच गरुड़ (वेणुदेव) देव हैं। मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (स्थान)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 154
SR No.034669
Book TitleAgam 03 Sthanang Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages158
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 03, & agam_sthanang
File Size4 MB
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