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________________ प्रथमा विभक्ति (कर्ता) भगवान् की आज्ञा पाकर सर्व प्रथम प्रथमा विभक्ति ने अपनी विशेषताएँ बतलानी शुरू कीं । उसने कहा - भगवन् ! मुझ में सब से अधिक विशेषताएँ हैं, अतः पहले मेरी विशेषताएँ सुन लें और बाद में जो कुछ भी निर्णय देना चाहें, देवें । भगवन् ! मैं सब विभक्तियों से बढ़ चढ़ कर हूँ । विद्वान् लोग मुझे कर्ता कहते हैं । आप जानते ही हैं कि संसार में कर्ता का कितना महत्त्व है । मैं पूर्णतया स्वतंत्र' हूँ, मुझपर किसी का भी अधिकार नहीं । अन्य सब विभक्तियाँ मेरे अधीन है, मैं सब पर शासन करती हूँ । I जितना भी साहित्य है, मैं ही सब में प्रमुख हूँ । गद्य और पद्य जितने भी काव्य हैं, सब में विद्वान् लोग मुझे ही सर्व प्रथम ढूँढ़ते हैं कि इसमें कर्ता कौन है ? जब मैं उन्हें प्राप्त हो जाती १ 'स्वतन्त्रः कर्ता' ' - शाकटायन प्रक्रियासंग्रह पृ० ९७ । mintette Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034656
Book TitleVibhakti Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherLala Sitaram Jain
Publication Year1941
Total Pages100
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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