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उपकेश वंश
सुना एक नम्र का राजा' । मिले है
भेट को लेकर ।
बनाने काम खुद अपना । यही युक्ती चलाई हैं |क०३॥ ख़रीदे श्रश्व जो पचपन्न | रुपैये लक्ष दे दे कर । नृपति को भेट करने की । उपलदे ने विचारी है ॥ क०४ ॥ दोहा - नित प्रति घोटक भेट दे, मिलना कभी न होय । पचपन दिन यों ही रहा, पचपन घोड़े खोय ॥
(तज - ना बेड़ो गाली दूँगा रे । )
अब श्रवसर ऐसा श्राया रे । तब भेंट हुई तत्काल || ढेर || राजा ने करी सवारी । घोड़ों की पंक्ति शृंगारी । खुश होगया शीघ्र निहारी रे । फिर पूछा यही सवाल ॥ श्र० १ ॥ ये घोड़े कहाँ से आये । जो सबको बहुत सुहाये । मंत्रि मन में पछताया रे । पर बोल दिया सब हाल ॥ श्र० २ ॥ है एक विदेशी श्राया । वह घोड़े इतने लाया । fra भेंट एक है या रे । सबकी है सुन्दर चाल ॥ श्र०३ || राजा ने उसे बुलाया । श्रादर से पास बिठाया । वरदान दिया मन भाया रे । तुम माँग लेहु इस काल ॥ श्र०४ || दोहा - घोड़े पैं मैं बैठ कर, जाऊँ जितना आज |
लीद जहाँ वह कर देवे, उतना पाऊँ राज ॥ १ ॥
१ टेलीपुर (दिल्ली) २ श्रीसाघुराज ३ किसी किसी पट्टावलियों में अश्व १८० भी लिखा मिलता है ।
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