SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 55
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री सुधर्मगध परीको. ( as ) चंडुगहना जसु परिचय शे, ते सांजळी अंतरावशे । १५० मांदोमां मंदे वाद, एक एकनो उतारे नाद; एक एकने खोटा उथरे, परदरशणी सखायत करे ॥ १५सा जो हुइ सामाचारी घणी, तो कां थापे थाप धारणी; पण जोजो बोकी मन राग, वीतरागनो एकज माग।१५५ यतः - मूढा एस इ । चुक्कंति जिगुत्तवया मग्गान ॥ हारंति को हिलानं | आयहियं नेव जाति ॥ १ ॥ ; जावार्थ:- मूढ एटले, मूर्ख माणसनी एवीज टेव छे के, जिनेश्वरे करेल जे श्रागममार्ग तेथी चूकी जाय वे धने वोधित्रीजने हारे छे. ध्यात्महितने तो जाणताज नथी, केमके तेश्रोनी एवी स्थिति होय बैं; माटे मूढवृतिने स्वाग करी जिनेश्वरनी थाणाने धारा धवी के पोथी कल्याण द्याय. यतः - जंकिंचि णुठाएं। जिणंद आलाएं बहु फचं होइ ॥ जह asana बीयं । धित्यारं लह वुते ॥ १ ॥ भावार्थ:- जे कोइ अनुष्ठान (क्रिया) ( जनेश्वरनी श्राज्ञापूर्वक थाय, तो ते किया बहु फळ आवनारी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy