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________________ (५) श्री सुधर्मगच परीक्षा. श्ररथ एक गणधर सवि कहे, एके श्राचारे सवि रहे; जू जुआ सूत्रपाउ गछ दृश्रा, पुण आचारेनविजू जुआ॥६ वीरथकां गणधर नव सिझ, पढे गोयम केवल लिझा थापापणा साधु सविजेह, थाप्यासुधर्मस्वामिने तेह। सौधर्मगठ एकज ते जाण, तेहतणी सवि माने आण; सूत्रतणी एकज वांचना, अंतर पुण नहि आचारना। केको जे साचा साधुनो, सघलो ते सौधर्मस्वामिनो; कल्पसूत्रना वचन विमास, सांजली श्री सद्गुरुनी पासाए यतः-जे इमे अऊत्ताए समणा निग्गंस्था विहरंति ए एणं सबे अऊ सुहमस्स अणगारस्स अवचिका ॥ अवसेसा गणहरा नरवच्चा बुचिन्ना ॥ नावार्थ:-आजकालने विषे जे श्रमण निग्रंथ आ प्रत्यक्ष विचरे , ते तमाम नगवान् श्री सुधर्म अणगारना शिष्य संतानीया जाणवा; बाकीना गणधरो ते शिष्य संतान रहित जाणवा. हिवणां जे दीसे गठ नाम, सूत्र न दीसे तेहने ठगम; बता कहे तेहने पूजो, मन संदेह सदू टालजो ॥१॥ सामाचारिने आंतरे, जो गल कहेवास्ये पांतरे; चउदहसय बावनतो जोय, सबसे श्राचरणा सोय ॥११ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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