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________________ ६६ सिद्धान्तकल्पवल्ली [ प्रतिबिम्बमें सत्यत्वमिथ्यात्ववाद इति वेदसन्निकर्षादपरोक्षानहमेव रूप्यमिति । अपरोक्षानुभववलाद्रूप्याभासस्य कल्पना युक्ता ॥ १५॥ ३. प्रतिबिम्बस्य बिम्बाभेदभेदाभ्यां सत्यत्वमिथ्यात्ववादः नन्वित्थं प्रतिविम्बभ्रमस्थले सन्निकर्षवैकल्यात् । मुकुरे मुखान्तरं स्याद् ग्रीवास्थितनिजमुखातिरेकेण ॥१६॥ इह न मुखस्याऽध्यासो मुकुराहतदृष्टिसनिकृष्टत्वात् । किन्त्वस्य मुकुरगत्वं भ्रम इति निगदन्ति विवरणानुगताः ॥१७॥ व्यवहितस्याऽसनिकृष्टस्याऽऽपरोक्ष्यासंभवाच्छुक्तिरजतादौ च तदनुभवात्तन्निाहाय तदुपगम इति परिहरति-इति चेदिति । अनेनाऽसनिकृष्टभ्रमस्थलेऽनिर्वचनीयविषयोत्पत्तिरिति नियमो दर्शितो भवति ॥ १५ ॥ अस्मिन्नियमेऽतिप्रसङ्गमाशङ्कते-नन्विति । संनिकर्षवैकल्यादिति ललाटादिप्रदेशावच्छेदेन मुखस्य सनिक भावादित्यर्थः । बिम्बातिरिक्तप्रतिबिम्बाभ्युपगमे ब्रह्मपतिबिम्बस्याऽपि जीवस्य ततो भेदेन मिथ्यात्वापत्या मुक्तिभाक्त्वानुपपत्तिरिति भावः ॥ १६ ॥ भवेदेवं यदि दर्पणे मुखस्याऽध्यासः स्यात् , न त्वेतदस्ति , तस्य दर्पणप्रतिइस शङ्काका समाधान करते हैं-'इति चेत्' इत्यादिसे । ऐसी शङ्का हो, तो उत्तर सुनिए, व्यवहित रूप्यके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं हो सकता और असनिकृष्ट शुक्तिरजतका अपरोक्ष नहीं हो सकता और यहाँपर अपरोक्ष अनुभव होता है, इस अनुभवसे यहाँ रूप्याभासकी कल्पना युक्त है। इससे असंनिकृष्ट भ्रमस्थलमें अनिर्वचनीय विषयकी उत्पत्ति होती है, ऐसा नियम बतलाया गया ॥१५॥ 'नन्वित्थम्' इत्यादि । ऊपर जो नियम दर्शाया गया, इसमें अतिप्रसङ्गकी शंका करते हैं यदि ऐसा नियम मानोगे, तो प्रतिबिम्बभ्रमस्थलमें संनिकर्षका वैकल्य होनेसे अर्थात् ललाटादिप्रदेशावच्छेदसे मुखका सन्निकर्ष न होनेसे आदर्शमें बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब अर्थात् प्रीवास्थित निजमुखसे अतिरिक्त मुख मानना होगा; इस नियमके अनुसार माननेसे ब्रह्मप्रतिबिम्ब जीवके भी ब्रह्मसे भिन्न होनेपर जीवमें मिथ्यात्वकी आपत्ति आ जायगी इससे जीवको मुक्तिप्राप्तिकी उपपत्ति न होगी, यह भाव है ॥ १६॥ 'इह न' इत्यादि । उक्त आपत्ति तभी आ सकती है, जब दर्पणमें मुखका अभ्यास Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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