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________________ ४२ सिद्धान्तकल्पवल्ली [ धाराके द्वितीयादिज्ञानकी सफलता अत्र प्रथमज्ञानतिरस्कृतमज्ञानमुपरते तस्मिन् । पुनरावृणोति वृत्त्यन्तरोदयेनेति सफलतामाहुः ।। ७५ ॥ अज्ञानानि हि तत्तत्कालिक विषयावृतिप्रगल्भानि । ज्ञानानि च स्वकालावृतिनाशकराणि तेन तामपरे ॥ ७६ ॥ प्राथमिकज्ञानतिरस्कृतमज्ञानं दीपतिरस्कृतं तम इव तस्मिन् ज्ञाने उपरते पुनरावृणोति । दीपान्तरस्येव ज्ञानान्तरस्योदये नाssवृणोति । किन्तु तथैवाऽवतिष्ठत इत्यावरणाभिभवपरिपालकतया द्वितीयादिज्ञानानां सफलताऽस्तीति मतेनोतरमाह - अत्रेति ॥ ७५ ॥ अज्ञानानि हि तत्तत्क|लोपलक्षितविषयावारकाणि । ज्ञानानि च स्वकालोपलक्षितविषयावरणनाशकानि । तेन धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानानामपि तत्तत्कालिक विषयावरणनाशकत्वेन सफलतेति मतान्तरमाह - अज्ञानानीति । ताम् – सफलताम् ॥७६॥ - उक्त शङ्काका परिहार करते हैं - 'अत्र' इत्यादिसे । इस विषय में कुछ लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे अज्ञानका तिरस्कार होता है, उसका तात्पर्य यह है - जैसे दीपसे तिरस्कृत अन्धकार दीपके उपरत हो जानेपर फिर घटादिका आवरण करता है, वैसे ही प्रथम ज्ञानके उपरत हो जानेपर फिर घटादिका अज्ञान आवरण करता है और जैसे अन्य दीपके आ जानेसे अन्धकार फिर आवरण नहीं करता, वैसे ही द्वितीयादि ज्ञानका उदय होनेसे पुनः अज्ञान आवरण नहीं करतातिरस्कृत ही रहता है; इस रीति से द्वितीयादि ज्ञान आवरणाभिभवको ज्यों-का-त्यों बना रखते हैं, इसलिए उन ज्ञानोंकी सफलता है ।। ७५ ।। इस विषय में मतान्तर दिखलाते हैं - 'अज्ञानानि' इत्यादिसे । अज्ञान तत्तत्कालोपलक्षित विषयका आवरण करते रहते हैं अर्थात् अज्ञान भिन्न-भिन्न समयमें विषयोंका आवरण करते रहते हैं और ज्ञान स्वकालोपलक्षित विषयके आवरणका नाश करते हैं याने ज्ञान जिस समय में होता है, उसी समय में विषयको आवृत करनेवाले अज्ञानका नाश करता है, दूसरेका नहीं। इससे धारावाहिक द्वितीयादि ज्ञान अपने समयमें विषयका आवरण करनेवाले अज्ञानका नाश करते हैं, अतः वे निष्फल नहीं हैं, यों अन्य मतवाले द्वितीयादि ज्ञानोंकी सफलता बतलाते हैं* ॥ ७६ ॥ * यह न्याय चन्द्रिकाकारका मत है - मूलाज्ञानके अवस्थारूप अज्ञान अनेक हैं, वे मूलाज्ञान के समान सर्वदा विषयोंको आवृत नहीं करते, किन्तु कुछ अज्ञान कुछ कालतक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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