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________________ ( २३० । एक दिन भद्रबाहु अपने नगरके राजा पद्मधरकी राजसभामें पधारे । राजाने भद्रबाहुका आदरपूर्वक स्वागत करते हुए उच्चासन दिया । राजसभामें और भी अनेक मभिमानी विद्वान विद्यमान थे । उन्होंने भद्रबाहुकी विद्वत्ता परखनेके लिये भद्रबाहुके साथ कुछ छेड छाड की। फिर क्या था, भद्रबाहुने बातकी बातमें समस्त अभिमानी विद्वानोंको अपनी गंभीर वाग्मितासे जीत लिया। उस समय स्याद्वाद सिद्धांत तथा जैनधर्मका राजसभाके समस्त सभासदोंके ऊपर बहुत भारी प्रभाव पडा । राजा पद्मधरने जैनधर्म स्वीकार कर लिया। इस भारी विजयके कारण भद्रबाहु का यश दूर दूर तक फैल गया। __अपने माता पिताके पास घरमें रहते हुए कुछ दिन बीत गये। एक दिन भद्रबाहुको संसारकी निःसार दशा देखकर वैराग्य उत्पन्न हुआ। वे घरको विकट जाल अथवा कारावास (जेलघर ) सम्झने लगे । कुटुंब परिवारका प्रेम उन्हें विष समान मालूम होने लगा। सांसारिक पदार्थ उन्हें विषफल समान दीखने लगे । इस कारण उन्होंने घर परिवारको छोडकर साधु बनकर वनमें रहनेका निश्चय किया। ___ इस विचारको प्रगट करते हुद जब भद्रबाहुने अपने मातापितासे मुनि बननेके लिये आज्ञा मांगी तब उनके माता पिताने गृहस्थाश्रमका सब प्रकार लोम दिखलाते हुए वैराग्यसे भद्रबाहुका चित्त फेरना चाहा । किन्तु भद्रबाहु सच्चे तत्वज्ञानी थे। संसारके भोगोंकी निष्फलता तथा साधु जीवनका महत्व उन के हृदय पटलपर अच्छी प्रकार अंकित हो चुका था । इस कारण वे गृहस्थाश्रमके लोभमें तनक भी नहीं फसे । पुत्रका दृढ लिश्चय देखकर भद्रबाहुके माता पिताने भद्रबाहुको साधु बननकी अनुमति दे दी। श्री भद्रवाहु स्वामी अपने मातापिताकी आज्ञा पाकर मुनिदीक्षा ग्रहण करनेके लिये अपने विद्या गुरु श्री गोवर्द्धन स्वामीके समीप गये । वहां पहुंच उनके चरणकमलों में मस्तक रखकर भद्रबाहुने गद्द स्वरमें प्रार्थना की कि पूज्य गुरो ! जिस प्रकार आपने मुझको । अनुग्रहपूर्ण हृदयसे ज्ञानप्रदान किया है उसी प्रकार अब मुझको निर्वाण Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034616
Book TitleShwetambar Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitkumar Shastri
PublisherBansidhar Pandit
Publication Year1930
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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