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________________ ( १५६ ) नहीं । यदि किसी रोगी मुनिके लिये उन चीजों की आवश्यकता हो तो दूसरी बात है । यानी -मुनि मछली और मांस रोगी मुनिके लिये ले सकता है । इससे इतना तो सिद्ध अपने आप हो जाता है कि रोगी मुनिकी चिकित्सा ( इलाज ) मांसके द्वारा हो सकती है। मांस मछली से चिकित्साका अर्थ यह ही है कि वह उस रोगी मुनिको खिलाया जाये क्योंकि मांस मछली खानेके ही काम में आते हैं । यदि कोई लोलुपी साधु मांस मछली खाना चाहे तो रोगी बनकर चिकित्सा के रूप में मांस मछली से अपनी इच्छा तथा बीमारी मिटा सकता है 1 तथा - साधुकी वैयावृत्य करनेके लिये वैयावृत्य करने वाला साधु मांस और मछली भी गृहस्थके यहां से मांगकर ला सकता है । ऐसा सूत्रकारका तथा टीकाकारका मत है । यह बात साधुओंके लिये हैं जो कि पांच महाव्रतवारी एकेंद्रिय तकके जीवोंकी रक्षा करनेवाले होते है ! इससे बढकर अनुचित अभक्ष्य भक्षण की बात और कौनसी होगी । यह सर्वज्ञ देव समझे । कुछ और देखना चाहते हैं तो और गी देखिये | साधुके चारित्रका हा प्ररूपण करने वाले इसी आचारांग सूत्रके १० व अध्यायके १० व उदेशक २०६ वें तथा २०७ वें पृष्ठपर ६२८ तथा ६३० का अवलोकन कीजिये 6 से भिक्खु वा से ज्जं पण जागज्जा, बहुअहियं मंसंवा, मच्छवा, बहुकटंग, अरिं खलु पडिगाहितंसि अप्पे सिया भोयणजाए, बहु धिग्गिए तपगार बहुअद्रियं मंसं मच्लंवा बहुकंटगं लाने संत जावोपडिजाजा ॥ ६२ ॥ 1: - अर्थात्-बहुत अस्थियो ( हड्डियों ) वाला मांस तथा बहुत कांटे वाली मछली को जिनके कि लेने में (हड्डियां, कांटे आदि ) चहुत चीज छाडनी पडे और बाडी बीज ( मांस ) खानेके लिये बने तो मुनिको बह नहीं लेना चाहिये । यानी मुनी ऐसा मांस खाने के लिये नहीं लेवे जिसमें फेंकने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034616
Book TitleShwetambar Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitkumar Shastri
PublisherBansidhar Pandit
Publication Year1930
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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