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________________ [82] जैन धर्म ना उपदेश 1. सोथी उत्कृष्ट मंगल धर्म छ। 2. धर्म अटले अहिंसा, संयम अने तप, जेमनु मन सदा धर्ममय होय छ तेमने देवताओं पण नमन करै छ । क्षमा, सन्तोष, सरलता अने नम्रता से चार धर्म द्वार कहवाये छ । 3. धर्म नु मूण विनय अथवा प्राचार अंटले के नियम छ । 4. सर्व प्राणीयों ने पोत पोतानी जींदगी प्यारी छ, सुख नी इच्छा सो कोई करे छ भने दुःख थी दूर भागे छ । वध कोई ने गमतो नथी, अने जीवन सो ने प्रिय लागे छ। जीववानी इच्छा सो कोई राखे छ। गमे तेम पण सर्वे नै जीवन प्रियकर छ । अंटले कोई पण प्राणीनी हिंसा करसो नहीं। 5. जे संसार ना दुःखो ने जाण छ ते कदी पापाचरण करताज नथी। 6. प्राशक्ति माणस ने साचेसाच परिग्रह कहयों छ । 7. गमे तेटलु वधारे भले तो पण जे परिग्रह न करै अने ग्रेवी परिगृह वृत्ति थी हमेशा दूर रहेवु। 8. सदा हितकारी वचन बोलवा जोइये । 9. कोई नी कोई पण चीज वस्तु आपण ने प्रापवामा न पावे त्या सुधी ___कदीये लेवी जोईये नहीं। 10. बुद्धिशाली माणसे मन वचन थी न तो कोई ने उतारी पाडवो जोईये न कोईनी मिथ्या प्रशंसा करवी जोईये । 11. समभाव नेज चरित्रय कहयु छ । 12. सदा सत्य मां सुदृढ़ रहवं जोईये । 13. सघली तपश्चर्या मां ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तप छ । 14. कर्म सदा कर्म करनार नी पाछल पाछल ज चालतु रहे छ । 15. सघलां दान मां अभयदान मोटु छ । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034609
Book TitleShraman Parampara Ki Ruprekha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJodhsinh Mehta
PublisherBhagwan Mahavir 2500 Vi Nirvan Samiti
Publication Year1978
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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