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________________ साध्वी व्याख्यान निर्णयः भी करते हैं, और जिस प्रकार साधुओं के लिए योगवहन करके सूत्र वांचनेका तथा उपधान वहन करके श्रावकोंको नवकार मंत्र आदि सूत्र पढनेका मुख्यवृत्तिसे कहा गया है तो भी अभी बहुत साधु योग वहन किये बिनाही सूत्र पढते हैं । और उपधा न किये बिना अनेक श्रावकश्राविकार्ये नवकार मंत्र पढ़ती हैं, और कल्पसूत्र भी रात्रि के समय वार्षिक प्रतिक्रमण किये बाद 'काउसग्ग' ध्यान में सर्व साधुओं को सुनने की मुख्य विधि थी, एक साधु सब को सुनाता था, परन्तु आजकल (अभी ) लाभ के कारण देशकाल के अनुसार प्रत्येक गाँव में सर्व संघ समक्ष " कल्पसूत्र " बांचा जाता है । इसी तरह से यद्यपि निशीथसूत्र को जानने वाले गीतार्थ साधु को व्याख्यान वांचने का मुख्यवृत्ति से कहा गया है परन्तु देशकाल के अनुसार लाभ के लिए इस समय सामान्य साधु-साध्वियों भी व्याख्यान बांच सकती हैं, इसमें कोई दोष नहीं है, इसलिए इसमें एकान्त हठ करना उचित नहीं है । ३० ४३ - जो महाशय कहते हैं कि-जीवानुशासन की वृत्ति श्रीजिनदत्तसूरिजी ने संशोधन की है, उसमें साध्वी को व्याख्यान बांचने का निषेध किया है, ये जिनदत्तसूरिजी खरतरगच्छवालों के दादाजी होते हैं, उनका वचन खरतरगच्छवालों को प्रमाण करना चाहिये, ऐसा कहनेवाले प्रत्यक्ष मिथ्यावादी हैं, क्योंकि यह वृत्ति १९६२ में बनी है और खरतरगच्छ के दादाजी को १९६६ में " सूरिपद " मिला है। इसलिए ये दोनों जिनदत्तसूरिजी भिन्न भिन्न हैं और वृत्ति संशोधन करनेवाले जिनदत्तसूरि के लिए "सप्तगृह निवासी " ऐसा विशेषण टीकाकार ने लिखा है, इसलिए यह जिनदत्तसूरिजी दूसरे हैं और वे जिनदत्तसूरिजी दूसरे हैं, जिनदत्तसूरिजी नाम के अनेक श्राचार्य हुये हैं। इसलिए वृत्तिका पाठ देखे बिना या दूसरों के कहने मात्र से अंध परंपरा से दादाजी का नाम लेकर भोले जीवों को भ्रम में डालना उचित नहीं है और ग्रन्थकार वृत्तिकार ने तथा वृत्ति संशोधन करनेवालों ने शुद्ध संयमी साध्वी के व्याख्यान बांचने का निषेध किया ही नहीं है। इसका विशेष खुलासा ऊपर लिख चुके हैं । ४४ - जो महाशय साध्वियों को निशीथसूत्र पढने का निषेध समझे बैठे हैं वे भी भूल करते हैं, साध्वियों को निशीथसूत्र पढने का निषेध किसी भी शास्त्र में देखने में नहीं आया, इसलिए साध्वियाँ निशीथसूत्र को पढ सकती हैं, किस किस कार्य करने से संयम धर्म में क्या क्या दोष लगते हैं, तथा प्रनादवश अज्ञानता से कोई दोष लग जावे उसका कितना कितना और क्या क्या प्रायश्चित आता है इत्यादि बातों की जानकारी “निशीथसूत्र " पढे बिना नहीं हो सकती, और उन दोनों का बचावपूर्वक शुद्ध संयम भी तभी पाला जा सकेगा, जव कि - " निशीथसूत्र " पढ लिया जावेगा । इसलिए बुद्धिमती ज्ञानी संयमी साध्वियों को गुरु से अपनी योग्यता अनुसार " निशीथसूत्र " अवश्य पढना चाहिये। इसी जीवानुशासन की १८४ नम्बर की गाथा जो ऊपर बतलाई गई है, उसका भावार्थ विचारकर समझने वाले कोई भी महाशय साध्वियों को निशीथसूत्र पढने का निषेध नहीं कर सकते। क्योंकि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034600
Book TitleSadhvi Vyakhyan Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagarsuri
PublisherHindi Jainagam Prakashak Sumati Karyalay
Publication Year1946
Total Pages64
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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