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________________ मिथ्यात्विक्रियाधिकारः। पुत्तस्स आजीवियो वासयस्स समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्तस्म समाणस्स इमेयाख्वे अज्झत्थिये ४ एसणं समणे भगवं महावीरे महामाहणे उप्पन्ननाणदंसणधरे जाव तच्चकम्मसंपया संपउत्ते" (उपासक दशांग अ० ६) अर्थ श्रमण भगवान महावीर स्वामीने गोशालक शिष्य शकडाल पुनसे कहा कि हे शकडाल पुत्र ! कल सन्ध्या समय अशोक वाटिकामें तू गया हुआ था। वहां एक देवताने तुम्हारे निकट आकाशमें स्थित होकर यह कहा था कि कल यहां महामाहन ज्ञान दर्शनका धारक यावत् सफल क्रियाओंसे युक्त पुरुष आवेगा तुम उसका वन्दन नमस्कार आदि यावत् शय्या संथारासे उपनिमंत्रित करना । यह सुन कर तुमने निश्श्रय किया कि "कल मेरे गुरु गोशालक मंखलिपुत्र आवेंगे उनकी वन्दना नमस्कार आदि यावत् उपासना मैं करूंगा" क्या यह बात सत्य है ? यह सुन कर शकडाल पुत्रने कहा कि हां सत्य है । तब फिर भगवान्ने कहा कि हे शकडाल पुत्र ! उस देवताने गोशालक मंखलिपुत्रके लिये ऐसा नहीं कहा था। इस प्रकार भगवान् महावीर स्वामीके कहने पर शकडाल पुत्रको यह निश्चय हुआ कि यह तो भगवान महावीर स्वामी हैं यही महामाहन ज्ञान-दर्शनके धारक यावत् सफल क्रियाओंसे युक्त है यह इस पाठका अर्थ है। इसमें स्पष्ट कहा है कि भगवान महावीर स्वामीने जब गोशालक शिष्य शकडाल पुत्रसे यह कहा कि “अशोक वाटिकाके अन्दर देवताने जो बात कही थी वह गोशालक मंखलिपुत्रके लिये नहीं" तव शकडाल पुत्रको यह मालूम हुआ कि यह श्रमण भगवान् महावीर स्वामी हैं पर हमारे गुरु गोशालक नहीं हैं। इससे निश्चित होता है कि शकडाल पुत्र अपने गुरु गोशालकको आया हुआ जानकर वहां आया था और आते समय उसने भगवान महावीर स्वामीको गोशालक समझ कर वन्दन नमस्कार किया था। अतः उसका यह वन्दन नमस्कार वास्तवमें भगवान महावीर स्वामीको न होकर उसके गुरु गोशालक मंखलि पुत्रका ही हुआ। पश्चात् भगवान् महावीर स्वामीके कहने पर जब उसका वह भ्रम दूर हुआ और उसने भगवान महावीरको जान लिया तब अशोक वाटिकामें मिले हुए देवताकी प्रेरणासे भगवान महावीर स्वामीको वन्दन नमस्कार किया था परन्तु उनको गुरु जान कर आन्तरिक भक्तिके साथ नहीं इसलिये इसका यह वन्दन नमस्कार भी भावशून्य होनेके कारण अहंभाषित धर्मका अङ्ग नहीं था किन्तु अहंदाज्ञावाह्य और मिथ्यात्व युक्त था। अत: इसे मोक्षमार्गमें नहीं कह सकते । परन्तु सुमुखगाथापतिका वन्दन नमस्कार आन्तरिक श्रद्धाके साथ होनेसे भावरूप था, इसलिये वह मोक्षका मार्ग और वीतराग भाषित धर्मका अङ्ग था। ऐसा भावरूप वन्दन नमस्कार Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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