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________________ वैयावृत्याधिकारः। नोपरे घणो झरसी। सातां दियां सातापरूपे तिणमें एतला अवगुण कह्या सावध सातामें धर्म किम कहिए । तेहथी तीर्थकर गोत्र किम बंधे" (भ्र० पृ० २५७) इसका क्या समाधान ? (प्ररूपक) सुयगसंग सूत्र की गाथाओंका नाम लेकर साधुसे इतरको साता देनेमें धर्मपुण्य का निषेध करना जगत्में अन्धकार फैलाना है। उन गाथाओंमें शाक्यादिकोंके मतका खण्डन किया है साधुसे इतरको साता देनेका निषेध नहीं किया है परन्तु भ्रमविध्वंसनकारने शास्त्र नहीं जानने वाले भोले लोगोंको भ्रमानेके लिये उन गाथाओं का विपरीत अर्थ करके साता देने को सावध बतलाया है अतः पाठकोंके ज्ञानार्थ उन गाथाओं को टीकाके साथ लिख कर बतलाया जाता है जिससे उनका भ्रम दूर हो जाय । "इहमेगे उभासंति सातं सातेन विज्जतो जे तत्थ आरियं मग्गं परमंच समाहि ए (4) मा एवं अवमन्नतो अप्पेणं लुम्पहा वहुएतस्स (उ) अमोक्खाए अओ हारिव्व जरह" (सुय० श्रु० १ अ०३ उ० ४ गाथा ६-७) ( टीका) मतान्तरं निराकर्तु पूर्व पक्ष यितु माह-इहेति मोक्ष गमन विचार प्रस्तावे एके शाक्या दयः स्वयूथ्याः वा लोचादिनोपतप्ताः तुशब्दः पूर्वस्मात् शीतोदकादिपरिभोगाद्विशेष माह-भाषते त्रुवते मन्यन्ते वा कचित्पाठः। किंतदित्याह-सातं सुखं सातेनैव सुखे नैव विद्यते । भवतीति । तथाचवतारो भवन्ति "सर्वाणि सत्त्वानि सुखेरतानि सर्वाणि दुःखाच्च समुद्विजन्ते ? तस्मात्सुखार्थी सुखमेव दद्यात सुख प्रदाता लभते सुखानि" युक्तिरप्येवमेवस्थिता। यतः कारणानुरूपं कार्य मुत्पद्यते तद्यथा शालिवीजाच्छाल्यं कुरो जायते न यवांकुर इत्येव मिहत्यात्सुखान्मुक्ति रुप जायते नतु लोचादि रूपा :खा दिति । तथा ह्यागमोऽप्येवमेव व्यवस्थित:-"मणुण्णं भोयणं भोच्चा मणुण्णं सयणा सणं मणुण्णं सि अगासि मणुण्णं झायए मुणी।" "मृद्वीशय्या प्रात रुत्थाय पेया। भक्त मध्ये पानकं चापराण्हे द्राक्षाखण्डं शर्कराचार्य रात्रे मोक्षश्चान्ते शाक्य पुत्रण दृष्टः । इत्यतो मनोज्ञाहार विहारादे श्चित्त स्वास्थ्य मुत्पद्यते चित्त समाधेश्च मुक्त - यवाप्तिः । अतः स्थित मे तत सुखे नैव सुखावाप्तिः । नपुनः कदाचनापि लोचादिना कायक्ले शेन सुखावाप्ति रिति स्थितम् । इत्येवं व्यामूढ मतयो केचन शाक्यादयस्वत्र तस्मिन् मोक्ष विचार प्रस्तावे समुपस्थिते आराद्यातः सवैहेय धर्मेभ्य इत्यार्यों मार्गों जैनेंद्र Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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