SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 393
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( प्रेरक ) Shorter क्या लक्षण है और वह संयति पुरुषोंमें क्यों नहीं होती यह सप्रमाण बतलाइये ? यह है श्याधिकारः । (प्ररूपक ) उत्तराध्ययन सूत्रमें कृष्ण लेश्याका लक्षण जिस प्रकार बतलाया है वह पाठ ३४३ "पंचासवप्पमत्तो तोहिं अगुत्तो छसु अविरयोय । तोव्वारंभ परिणयो खुद्दो सहसिओनरो । निद्ध धस परिणामो निस्संसो अजि इन्दिओ । एय जोग समाउत्तो कण्हलेस तु परिणमे । " ( उत्तराध्ययन अ० ३४ गाथा ३१ । २२ ) - ( टीका ) पञ्चाश्रवाः हिंसादयः तैः प्रमत्तः प्रमादवान पञ्चाश्रव प्रमत्तः पाठान्तरतः पश्वाश्रव प्रवृत्तो वाऽत स्त्रिभिः प्रस्तावान्मनोवाक्कायै रगुप्तोऽनियन्त्रितो मनोगुप्त्यादि रहित इत्यर्थः तथा पट सु पृथिवीकायादिषु अविरतः अनिवृत्तस्तदुपमर्दकत्वादेरितिगम्यते । Parivaarjastiदतआह तीम्रा उत्कटा स्वरूपतोऽध्यवसायतोवा आरंभाः सर्वसावंद्य व्यापारास्तत्परिणतः तत्प्रवृत्त्या तदात्मतां गतः तथा क्षुद्रः सर्वस्यैवा हितैषी कार्पण्य युक्तोवा सहसा अपर्य्या लोच्य गुण दोषान प्रवर्तत इति साहसिकः चौर्य्यादि कृदिति योऽर्थः नरः उपलक्षणत्वा त्स्त्र्यादिर्वा "निद्ध ं धस " त्ति अत्यन्त मैहिकामुष्मिकापायशंकाविकलोऽत्यन्तं जन्तुवाधानपेक्षोवापरिणामोऽध्यवसायोवा यस्यसतथा । नृसंसो निस्तृ शो जीवान, विहिंसन मनागपि नशंकते निःसंसोवा पर प्रशंसा रहितः अतितेन्द्रियः अनिगृहीतेन्द्रियः । अन्येतु पूर्व पूर्वसूत्रोत्तरार्धस्थाने इदमभि धीयते तच्चे हेति उपसंहारमाह एतेच अनंतरोक्ताः योगाश्च मनोवाक्काय व्यापाराः एतद्योगाः पञ्चावश्र प्रमत्तत्वादय स्तैः समिति भृश माङिति अभिव्याप्त्या युक्त: अन्वितः एतद्योग समायुक्तः कृष्णलेश्यांतुः अवधारणे कृष्ण लेश्या मेवपरिणमेत् तद् द्रव्यसाचित्येन तथाविध द्रव्य संपर्कात् स्फटिक वत्तदु पर रंजनात तद्र ूपतां भजेत उक्त हि "कृष्णादि द्रव्यसाचिव्यापरिणामोय आत्मनः स्फटिकस्येव तत्रायं लेश्या शब्दः प्रयुज्यते" - Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat अर्थात् हिंसा आदि पांच आस्रवोंमें प्रमत्त यानी मग्न रहने वाला या प्रवृत्त रहने - वाला अतएव मन वचन और कायासे अगुप्त अर्थात् मनोगुप्ति आदि तीन गुप्तियोंसे रहित तथा पृथिवी आदि छः कायके जीवोंके उपमद से नहीं हटा हुआ स्वरूप और www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy