SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 313
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुकम्पाधिकारः । २६३ उक्तिके अनुसार अपनी रक्षा करना साधुका कर्तव्य नहीं होता तो इस पाठमें नदी तैर कर साधुको अपनी रक्षा करना कैसे बतलाया जाता ? वह पाठ यह है: "सेभिक्खूवा उदगंसि पवमाणे नो हत्थेणं हृत्थं पाएण पायं काएण कार्य आसाइज्जा से अणासायणाए अणासायमाणे तओ सं० उद्ग सि पविज्जा । G. सेभिक्ख वा उद्गसि पवमाणे नो उमुग्ग निमुग्गियं करिज्जा मामेयं उद्ग कन्नेसुवा अच्छीसुवा नक्क सिवा मुहंसिवा परियाकजिज्जा तओ संजयामेव उद्गसि पविज्जा | सेभिक्ख वा उद्ग सि पवमाणे दुब्बलियं पाउणिज्जा खिप्पामेव उवहिं विगि चिज्जवा विसो हिज्जवा नो चेवणं साइजिज्जा । अह पु० पारए सिया उदगाओ तीरं पाउत्तिए तओ संजयामेव उदउल्लेणवा ससिद्धि णवा कारण उद्गतीरे चिट्टिज्जा" ( आचारांग श्रु० २ अ० २६ ) अथ: साधु या साध्वी जलसे तैरकर पार करते समय हाथसे हाथका, पैरसे पैरका और शरीरसे शरीरका स्पर्श न करें । किन्तु अपने • अङ्गोंका परस्पर स्पर्श न होने देकर जयणाके साथ जलको पार करें। तैरते समय जलमें डूब्बी न लगावें और अपने आंख, कान, नासिका और मुखमें जलन पैठने दे । जलमें तैरते तैरते यदि साधुके अंग दुर्बल हो जायँ तो वह अपने उपकरणोंको तुरन्त उसी जगह छोड़ देवे उनमें थोड़ी भी मूर्च्छा न लावे । यदि भाण्डोपकरणोंको लेकर साधु पार जाने में समर्थ हो तब उन्हें छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है । इस प्रकार जलसे पार हो कर जबतक शरीर से जलके बिन्दु गिरें और शरीर भींगा रहे तबतक साधु जलके किनारे पर ही खड़ा रहे, यह ऊपर लिखे हुए पाठका अर्थ हैं । यहां जलसे तैरकर साधुको पार जाना कहा है जलमें डूबकर मरना नहीं कहा है। इसलिए इस पाठसे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि साधु अपनी रक्षा करना पाप नहीं समझते ? जब अपनी रक्षा साधु करता है और उससे उसे पाप नहीं होता तो दूसरेकी रक्षा करनेसे उसे पाप कैसे हो सकता है ? अतः भीषणजीने साधुको जलमें डूब मरनेकी जो वात लिखी है वह एकान्त मिथ्या है । यदि कोई कहे कि “नदी पार करते समय साधुसे जलके जीवोंकी विराधना तो होती ही है फिर वह नावमें आता हुआ पानी बतलाकर अपनी और दूसरे की रक्षा क्यों नहीं Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy