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________________ २१० सद्धममण्डनम् । लालित: तत स्तृतीयया तृतीय महो दीनार कोटि व्ययेन सत्कारितः । चतुर्थ्यातु राजानुमत्या मरणाद्रक्षितोऽभयप्रदानेन । ततोऽसावन्याभिहसिता नास्यत्वया किश्चिद्दसमिति । तदेवं तासां परस्परं बहूपकारविषये विवादे जाते राज्ञाऽसावेव चौरः समाहूय पृष्ठः "यथाकेन तव वहूपकृतम्" तेनाप्यभाणि यथा न मया मरणमहाभयभीतेन किञ्चित् स्नानादिकं सुखं व्यज्ञायि अभयप्रदानाकर्णनेन पुनर्जन्मानमिवात्मान मवैमीति अत: सर्वदानाना मभय प्रदानं श्रेष्ठ मिति स्थितम् । अर्थ: अपने या परायेके अनुग्रहके लिये याचक पुरुषको जो दिया जाता है वह दान कहलाता है। वह अनेक प्रकारका है उनमें सबसे श्रेष्ठ अभयदान है। अभयदान, जीने की इच्छा रखने वाले प्राणियोंके जीवनकी रक्षा करता है इसलिये वह सब दानोंमें श्रेष्ठ माना गया है। कहा भी है-मरते हुए प्राणीको एक तरफ कोटि कोटि धन, और दूसरे तरफ जीवन दिया जाय तो वह धन कोटिको न लेकर जीवनको ही लेता है क्योंकि जीवोंको सबसे ज्यादा जीवन प्रिय है अत: सब दानोंमें अभय दान ही श्रेष्ठ है। साधारण बुद्धिवालों को समझानेके लिये अभयदानकी प्रधानता दृष्टान्तके द्वारा बतलाई जाती है .: वसन्तपुर नगरमें अरिदमन नामक राजा रहता था। वह किसी समय अपनी चार रानियोंके साथ झरोखे पर बैठ कर क्रीडा करता था। उसने अपनी स्त्रियोंके साथ, राजमार्गसे ले जाया जाता हुआ कण्ठमें लाल कनैलके फूलकी माला लगाया हुआ साल कपड़ा पहिना हुआ शरीरमें रक्त चन्दनका लेप किया हुआ और बाजा बजा कर बध करनेकी घोषणा किया जाता हुआ किसी चोरको देखा। उसे देख कर रानियोंने पूछा कि “इसने क्या अपराध किया है ?" यह सुन कर किसी राजपुरुषने कहा कि "इसने चोरी करके राजाकी आज्ञा उल्लञ्चन की है" इसके अनन्तर एक रानीने राजासे कहा कि "आपने जो मुझे पहले वरदान देना स्वीकार किया था वह अभी दे देवें जिससे मैं इस चोरका कुछ उपकार कर सकू” यह सुन कर राजाने वरदान देना स्वीकार कर लिया। रानीने राजासे यह वर मांगा कि “इस चोरको स्नान आदि करा कर भूषण आदि पहिना कर हजार मोहरके व्ययसे एक दिन तक शब्दादि पांच विषयोंका सुख दिया जाय।" पश्चात् दूसरी रानीने दूसरे दिन उस चोरको एक लाख मोहरके व्ययसे सुख देनेका वर मांगा। तीसरीने तीसरे दिन एक कोटि मोहरके व्ययसे उसे सुख देनेको कहा । परन्तु चौथी रानीने राजासे वर मांग कर उस चोरको अभयदान देकर मरनेसे बचा लिया। यह देख कर पहली तीन शानियां चौथी रानीकी हंसी उडाने लगी के कहने लगी कि इस Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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