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________________ २०० इसका क्या समाधान ? (प्ररूपक) ठाणाङ्ग सूत्रका वह पाठ लिख कर इसका समाधान किया जाता है। वह पाठ यह है : "चविहे पणिहाणे मन पणिहाणे वय पणिहाणे काय पणिहाणे उवगरण पणिहाणे । एवं नेरइयाणं जाव वेमाणियाणं । चविहे सुप्पणिहाणे पण्णत्ते तंजहा मन सुप्पडिहाणे जाव उपकरण सुपणिहाणे एवं संजय मणुस्साणवि । चउब्विहे दुष्पणिहागे पं० तं० मन दुष्पsिहाणे जाव उवगरण । एवं पञ्चेन्द्रियाणं जाव वैमाणियाणं" ( ठागाङ्ग ठाणा ४ उद्देशा १ ) सद्धमंमण्डनम् । ( टीका ) “प्रणिधानं प्रयोगः तत्र मनसः प्रणिधानम् आतंरौद्र धर्मादि रूपतया प्रयोगो मन: प्रणिधानम् । एवं वाक्काययोरपि उपकरणस्य लौकिक लोकोत्तररूपस्य वस्त्र पात्रादेः संयमा संयोपकाराय प्रणिधानं प्रयोगः उपकरण प्रणिधानम् । एवमिति तथा सामान्यत स्तथा नैरयिकाणामिति । तथा चतुर्विंशति दण्डक पठितानां मध्ये ये पन्चेन्द्रियास्तेषा वैमानिकान्तानामेवेति । एकेन्द्रियादीनां मनः प्रभृतीनाम संभवेन प्रणिधाना संभ I वात् । प्रणिधान विशेषः सुप्रणिधानं दुष्प्रणिधानव्चेति तत्सूत्राणि । शोभनं संयमार्थत्वा त्प्रणिधानं मनः प्रभृतीनां प्रयोजनं सुप्रणिधानमिति । इन्च सुप्रणिधानं चतुर्विंशति दण्डक निरूपणायां मनुष्याणां तत्रापि संयतानामेत्र भवति चारित्रपरिणतिरूपत्वात्सु प्रणिधानस्येत्याह "एवं संजए" इत्यादि, दुष्प्रणिधान सूत्र सामान्य सूत्रवत् नवरं दुष्प्रणिधानम् असंयमार्थं मनः प्रभृतीनां प्रयोग इति” अर्थ: - प्रयोग करनेका नाम “प्रणिधान " है। आर्त रौद्र और धर्म आदि ध्यान करना " मनः प्रणिधान " कहलाता है । इसी तरह वचन और शरीरके प्रयोगको क्रमशः वचन प्रणिधान और काय प्रणिधान कहते हैं । उपकरण नाम वस्त्र पात्र आदिका है वह दो तरहका होता है लौकिक और लोकोत्तर, उनका संयम और असंयम के लिये प्रयोग करना उपकरण प्रणिधान कहलाता है । ये चारों प्रणिधान नारकि पञ्चेन्द्रियसे लेकर मावत् वैमानिक देव तकके प्राणियों में होते हैं । एकेन्द्र आदि जीव जो मनोविकल हैं उनमें उक्त चतुर्विध व्यापार नहीं होते । प्रणिधान विशेष को सुप्रणिधान और दुष्प्रणिधान कहते हैं। मन, वचन काय और उपकरणका प्रयोग जो संयम पालनार्थ किया जाता है वह सुप्रणिधान है। यह सुप्रणिधान, चतुर्विंशति दण्डकके जीवोंमें केवल Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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