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________________ राष्ट्रकूटों का इतिहास २ महीचन्द्र यह यशोविग्रह का पुत्र था । इस को महियल, महिल, या महीतल भी कहते थे । १२४ यह महीचन्द्र का पुत्र था । इसके, वि. सं. ११४८ स० १०९३ ), और वि. सं. चन्द्रावती से मिले हैं । ३ चन्द्रदेव ( ई. स. १०६१ ), वि. सं. ११५० ( ई. ११५६ ( ई. स. ११०० ) के, तीन ताम्रपत्रे इसके वंशजों के ताम्रपत्रों से प्रकट होता है कि, इसने मालवे के परमार नरेश भोजै, और चेदिके कलचुरि ( हैहयवंशी ) नरेश कर्ण के मरने पर उत्पन्न हुई अराजकता को दबाकर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया था । इसके पहले ताम्रपत्र से अनुमान होता है कि, इसने वि. सं. ११११ ( ई. स. १०५४ ) के करीब बदायूं पर अधिकार कर कुछ काल बाद प्रतिहारों से कन्नौज भी छीन लिया था । ( १ ) वि० सं० ११५० के ताम्रपत्र में कन्नौज के प्रतिहार राजा देवपाल का भी उल्लेख है:- "श्रीदेवपालनृपतिस्त्रिजगत्प्रगीतः " । देवपाल का, वि० सं० १००५ ( ई० स. ९४८ ) का, एक लेख मिला है। (एपिग्राफिया इण्डिका, भा० १, पृ. १७७) ( २ ) ऐपिग्राफिया इण्डिका, भ:०६, पृ० ३०२; और भा० १४, पृ० १४२-२०४ (३) "याते श्रीभोजभूपे विधु (बु) धवरवधूनेत्रसीमातिथित्वं श्रीकणे कीर्तिशेषं गतवति च नृपे दमात्यये जायमाने । भर्तारं यं व (ध) रित्री त्रिदिवविभुनिभं प्रीतियोगादुपेता त्राता विश्वासपूर्वं समभवदिह स क्ष्मापतिश्चन्द्रदेवः ॥ ३ ॥" अर्थात् पृथ्वी स्वयं, भोज और कर्ण के मरने पर उत्पन्न हुई गड़बड़ से दुःखित होकर, चन्द्रदेव की शरण में गयी । कुछ ऐतिहासिक यहां पर भोज से प्रतिहार भोज का तात्पर्य लेते हैं । (४) भारत के प्राचीन राजवंश, भा० १, पृ० ५० (५) कुछ लोग वि० सं० ११३५ ( ई० स० १०७८ ) के करीब चन्द्र का कन्नौज अनुमान करते हैं । लेना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034595
Book TitleRashtrakuto (Rathodo) Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVishweshwarnath Reu
PublisherArchealogical Department Jodhpur
Publication Year1934
Total Pages182
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size27 MB
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