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________________ अध्यात्म की शिक्षा हैं और अपने आसपास के स्थान का थोड़ा बहुत अन्दाजा कर सकने में समर्थ होती हैं। __जो लोग इन तहखानों में कई साल बिता चुके हैं, उनका कहना है कि ये कोठरियाँ अद्भुत दिव्य-प्रकाश से आलोकित रहती हैं। कभी तो इनमें रोशनी भर जाती है, कभी कमरे की प्रत्येक वस्तु प्रकाश से चमकने लगती है और कभी खिले हुए फूल, आकर्षक प्राकृतिक दृश्य और जब-तब सुन्दर दिव्यांगनाएँ इन्हीं कमरों में उनके सामने आ-आकर प्रकट होती हैं। दिलबहलाव के लिए इन चीजों के सिवा और बहुत से प्रलोभन इन तहखानों में साम्सपा का स्वागत करते हैं। धार्मिक आचार्यों के मतानुसार ये कम साहसी, अल्प बुद्धिवाले शिष्यों को भुलावे में फाँसने के लिए होते हैं । त्साम्सपा जब इन अँधेरी कोठरियों में कई साल बिता चुकता है और उसके एकान्तवास को अवधि समाप्त होती रहती है तो थोड़ा-थोड़ा करके वह अपने नेत्रों को फिर प्रकाश से अभ्यस्त करना आरम्भ करता है । इसके लिए उसकी कोठरी की एक दीवाल में ऊपर एक बहुत छोटा सा छेद कर दिया जाता है। रोज इसे थोड़ा-थोड़ा करके बड़ा करते जाते हैं। शुरू-शुरू में यह आल्पीन के ऊपरी सिरे के बराबर होता है और धीरे-धीरे बड़ा होता-होता यह खिड़की के आकार का हो जाता है। यह काम या तो साम्सपा खुद करता है या उसके मित्रों में से कोई अथवा उसका गुरु। जितनी लम्बी एकान्तवास की अवधि होती है, उतना ही अधिक समय इस छेद को बड़ा करने में लग जाता है। जो लोग अपनी जिन्दगी में पहली बार इन कोठरियों में बन्द होते हैं वे एकान्तवास की अवधि में समय-समय पर अपने गुरु से मन्त्र भी लेते रहते हैं। यह गुरु उनसे बाहर से ही Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, kurnatumaragyanbhandar.com
SR No.034584
Book TitlePrachin Tibbat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamkrushna Sinha
PublisherIndian Press Ltd
Publication Year
Total Pages182
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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