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________________ प्रा० जै० इ० दूसरा भाग [ तृतीय ] महाराजा अशोक और महाराजा प्रियदर्शिन ये दोनों ही भिन्न-भिन्न व्यक्ति थे। [विभाग तीसरा पैरा २, ५, ६, ७,८, ११, १८, २४, २६, २७, २८, २६ और ३० देखिए] [चतुर्थ ] महाराज प्रियदर्शिन और जैन संप्रदाय के राजा संप्रति दोनों एक ही पुरुष थे । ( विभाग तीसरा पैरा नं० ३, ५, १५, २५, २५, २८ और ३० देखिए) उनका दूसरा नाम'२७ दशरथ भी हो सकता है (पैरा ११ देखिए)। .. [पंचम ] प्रियदर्शिन् शब्द विशेष नाम है, गुणवाचक विशेषण नहीं (विभाग तीसरा, पैरा नं० ३० देखिए) विद्वानों के हृदय में जो दो-एक शंकाएँ उत्पन्न हो सकती हैं, उनका समाधान इस लेख को समाप्त करने से पूव कर देना उचित होगा, (१) यदि अशोक ही प्रियदर्शिन् न होतो मक्सी के शिलालेख में अशोक शब्द स्पष्ट शब्दों में क्यों लिखा गया है ? (२) प्रियदर्शिन् बौद्धधर्म के यात्रास्थान लुम्बिनि और निग्लिवि नामक गाँवों में क्यों गया ? यदि वह स्वत; बौद्धधर्मी न होता तो वहाँ क्यों जाता ? इसी लिये प्रियदर्शिन् ही अशोक हो सकता है। इन दो शंकाओं का समाधान-[प्रथम शंका यह निर्विवाद है कि मक्सी के शिलालेख में महाराजा अशोक के नाम का निर्देश हुआ है। किन्तु उसमें "देवाणां प्रिय अशोकस्य......" इस प्रकार के शब्द हैं । इसमें पहली दलील यह है कि 'देवाणां प्रिय"२७ शब्द तो प्रत्येक भक्तजन के लिये सम्बोधन में उपयोग (१२७) पाद टीका नं. २ (पृ० ४५) देखिए । (१२७ अ) सिलोन के राजा तिस्सा को संबोधन करते समय भी देवाण प्रिय शब्द का उपयोग किया गया है। ( देखिए दीपवंश ता० Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034583
Book TitlePrachin Jain Itihas Sangraha Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTribhuvandas Laherchand Shah
PublisherRatnaprabhakar Gyanpushpmala
Publication Year1936
Total Pages82
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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