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________________ (९२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। विद्यालये मालवसंझदेश रत्नावतीरम्यनिवासवासी । औदुंबरः पाठकवंशजातः सुपूज्य विद्यान्वितनंदरामः ॥५६॥ तत्पौत्रमन्त्रशास्त्रज्ञरेवाशंकरसूनुना। महादेवेन रचिता पत्रीमार्गप्रदीपिका ॥५६॥ माघस्य शुक्लपञ्चम्यां शाके माझछकैमिते ॥ संपूर्णा भार्गवे वारे पत्रीमार्गप्रदीपिका ॥१७॥ इति श्रीमहादेवकतपत्रीमार्गप्रदीपिका संपूर्णा । विद्याका स्थान ऐसे मालवसंज्ञक देशमें अविरमणीय रत्नावती नगरी ( रतलाम शहर)में निवास करनेवाले औदुम्बर ज्ञावीय पाठकवंशमें उत्पन्न उत्तम विद्यायुक्त नन्दरामजी हुए ।। ५५ ॥ उनके पौत्र मोतीरामजीके पुत्र मंत्रशास्त्रके जाननेवाले रेवाशंकरजी हुए, उनके पुत्र महादेव ज्योतिर्विदने पत्रीमार्गप्रदीपिका नाम ग्रन्थ बनाया ॥ ५६ ॥ वह पत्रीमार्गप्रदीपिका शालिवाहन शक १७९५ सतरासौ पंचानवेमें माघ शुक्ल पंचमी भृगुवारके दिन संपूर्ण हुई ॥५७॥ मार्गशीर्षसिते पक्षे द्वादश्यां गुरुवासरे ॥ कक्ष्यष्टभूमिवे शाके कतेऽयं विवृविर्मया ॥१॥ इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकतपत्रीमार्गप्रदीपिकायां वदात्मनश्रीनिवासज्योतिर्विद्विरचिवा सोदाहरणभाषाटीका समाप्तिमयमत् ॥ इति पत्रीमार्गप्रदीपिका समासा । १ "कटपयवर्गभवैरिहपिण्डांत्यैरक्षररकाः ॥ ननि च ज्ञयं शून्यं तथा स्वरे केवले कथितम् ॥ १ ॥" इस प्राचीन कारिकाके वचनानुसार म-के ५ झ के ९ छ-के ७ क-के १ ऐसे मा झ छ क के अंकोंका अंकानां वामतो गतिः इस क्रमसे १७९५ सतरासौ पञ्चानवे होते हैं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034576
Book TitlePatrimarg Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahadev Sharma, Shreenivas Sharma
PublisherKshemraj Krishnadas
Publication Year1851
Total Pages162
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size27 MB
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