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________________ [६९] SHREET नहीं हो सकती इसी तरहसे भगवानकेभी देवानंदा माता तथा त्रिशलामाता दोनोंका गर्भकाल मिलकर ९ महीने और ऊपर ७॥ दिन मानतेहैं, मगर देवानंदाके गर्भ में आनेको शास्त्रकारोंने अच्छेरा कहा है. और ८२ दिन गये बाद त्रिशलाके गर्भ में आनेको तीर्थकर पनेके भवमे गिनाहै, इसलिये देवानंदाके गर्भमे आये तब च्यवन कल्याणक के सर्वकार्य नहीं हुए, परंतु त्रिशलाके गर्भमे आये तबही च्यवनकल्याणकके सर्व कार्य हुए हैं. तो भी देवानंदाके गर्भमें भगवान आये तंब माताने १४ महास्वप्न देखे,तथा ८२ दिनतक वहां विश्रामलिया और शरीर-इन्द्रीय-पर्याप्ति देवानंदामाताके शरीरसे बने हैं. इसलिये देवानंदाके गर्भमें आनेकोभी भगवानके प्रथम च्यवनरूप कल्याणक पना मानते हैं । और जैसे-मारवाड,गुजरात,दक्षिण, पूर्व वगैरह दे. शो में पुत्रको दत्तक [गोद ] लेनेमें आताहै, उनके पहिलेके मातापिता अलगहोते हैं और पीछेपालने पोषनेवाले दूसरे मातापिता अलगहोते हैं, इसलिये उनके दो माता और दो पिता कहने में कोई दोष नहीं आता, मगर नाम पीछवालोका चलता है । तैसेही भगवानकेभी दे वानंदाके गर्भले ८२दिन गये बाद आश्चर्यरूप त्रिशलाके गर्भमें आना पडा, उससे दो माता तथा दो पिता और दो च्यवन कल्याणक मा. ननेमें आते हैं. इसलिये दोनों माताओंका गर्भकाल मिलकर ९महीने और ७॥ दिन हुए हैं, तो भी दो च्यवन कल्याणक मानने में कोई भी शास्त्र बाधा नहीं आ सकती और कोई कुयुक्ति व वितर्कभी बाधकन ही होसकती, इस बातको विशेष तत्त्वज्ञजन स्वयंविचार सकते हैं। इन सर्वबातोका विशेषनिर्णय ऊपरके भूमिकाके लेखमें और इस ग्रंथमें अच्छीतरहसे सर्व शंकाओंका निवारणपूर्वक खुलासा होचकाहै, यहां तो उसका संक्षिप्तसार बतलायाहै,और विशेष निर्णय क. रनेकी अभिलाषावाले तत्त्वसारग्रहण करनेवाले पाठकगण इस ग्रंथ. को संपूण वांचेगे तो सर्वबातों का खुलासा अच्छी तरहसे होजावेगा विवादवाले विषयों संबंधी अभिप्राय. : तपगच्छके श्रीमान् विजयधर्मसूरिजोके शिष्य श्रीमान् रत्न. विजयजीने विवादवाले विषयों संबंधी पौषशुदी३बुधवार,श्रीवीरनि. ण संवत् २४४३ के जैन शाशन पत्रके पृष्ठ ५८८ में श्रीपार्श्वनाथस्वामीकी परंपरासंबंधी उपकेशगच्छ (कवलागच्छ) की हकीकत छपवाया है, उसका थोडासा उतारा यहांपर बतलाते हैं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034484
Book TitleBruhat Paryushana Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagar
PublisherJain Sangh
Publication Year1922
Total Pages556
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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