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________________ [५८] षबाकीके कल्याणकही रहजावेंगे.और नीचगौत्रके विपाकरूप तथा आश्चर्यरूप कहते हुएभी प्रथम च्यवनको कल्याणकपना मानोगे,तो. नीचगौत्र विपाकरूप और आश्चर्यरूप कहकर दूसरे च्यवनरूप गर्भा पहारको कल्याणकपने रहित ठहराया सो प्रत्यक्षमिथ्या व्यर्थही झूठा आग्रह सिद्ध होवेगा. इसलिये ऐसे झूठे आग्रहसे भोले जीवोंको सं. शयरूप मिथ्यात्वके भ्रममें गेरकर भगवानकी आशातनाका हेतुभूत अनर्थ करना सर्वथा योग्य नहीं है. किंतु प्रथम च्यवनमें कल्याणक पना माननेकी तरहही दूसरे च्यवनमेभी कल्याणकपना आगमादि शास्त्रप्रमाण तथा युक्तिसम्मत होनेसे आत्मार्थियोंको अवश्यही मान्यकरना उचित है, इसको विशेष तत्त्वज्ञजन स्वयंविचारसकते हैं। औरभी प्रत्यक्ष शास्त्रप्रमाण देखिये-कल्पसूत्रकी सर्व टीकायें वगैरह बहुतशास्त्रों में श्रीजंबूस्वामिके निर्वाणगयेबाद दश(१०) वस्तु विच्छेद होनेका लिखाहै. उसमें केवलज्ञान,केवलदर्शन, यथाख्यातचारित्र,मुक्तिगमन वगैरह बातोंकोभी वस्तु कहाहै. और 'गुणस्थानक्रमारोह वगैरह शास्त्रोममी केवलज्ञान उत्पन्नहोनेको,तथा मुक्तिगम. नको १३-१४ वा गुणस्थान कहाहै. इसी तरहसे इन शास्त्रप्रमाण मु. जबभी तीर्थकर भगवानके केवलज्ञान उत्पन्न होनेको तथा मुक्तिगमन निर्वाणको वस्तु कहो या स्थान कहो और उन्होकोही केवलशान तथा निर्वाण कल्याणकभी मानो,तो भी इस बातमें कोई तरहका वि. रोधभाव नहीं है, इसलिये च्यवनादिकोको वस्तु कहो, या स्थान कहो, वा कल्याणककहो, सबका तात्पर्यार्थसे भावार्थ एकही है. जिस परभी वस्तु-स्थान कहकर कल्याणकपनेका निषेध करनेवाले अपनी अज्ञानतासे शास्त्र विरुद्ध प्ररूपणा करके भोलेजीवोंको उन्मार्गमें गेरते हैं, और अपनी आत्माकोभी उत्सूत्र प्ररूपणाके दोषसे मलीन करते हैं. इसबातकोभी विवेकी तत्त्वज्ञजन स्वयं विचार सकते हैं। और तीर्थकरभगवानके च्यवनादिकोंको कल्याणकपना आगमानु. लार अनादिसिद्धहै, उन्हीं च्यवनादिकोंको शास्त्रोंमें एक जगह स्थान कहे,दूसरी जगह वस्तु कहे, तीसरी जगह कल्याणक कहे, इससेभी वस्तु-स्थान-कल्याणक यह तीनों शब्द पर्यायवाचक एकार्थवाले सिद्ध होतेहैं जिसपरभी वस्तु-स्थान शब्द देखकर अनादिसिद्ध व्य. वनादिमें कल्याणक अर्थको उडादेना सो अपने झूठे पक्षपातके आनहसे शास्त्रविरुद्ध प्ररूपणा करनेरूप यह कितनी बड़ी भूल है इसको Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034484
Book TitleBruhat Paryushana Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagar
PublisherJain Sangh
Publication Year1922
Total Pages556
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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