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________________ [ ३५५ ] भ्रममें फंसाने वाले होनेसे उन्होंमें भावदयाका तो सम्भवही मही हो सकता है किन्तु संसार वृद्धिकी हेतुभूत भावहिंसाका कारण तो प्रत्यक्ष दिखता है। .. और सातवें महाशयजीने सिद्धान्तानुसार परोपकार दूष्टिसें पर्युषणा विचार नहीं लिखा है किन्तु पञ्चाङ्गीके सिद्धान्तोंके विरुद्ध बालजीवोंको श्रीजिनाज्ञाकी शुद्ध अवारूप सम्यक्त्वरत्नसें भ्रष्ट करनेको उत्सूत्र भाषणोंका संग्रह करके अपने कदाग्रहकी कल्पित बात जमानेके आग्रह सें पर्युषणा विचारके लेखमें पर्युषणा सम्बन्धी श्रीजैनशास्त्रोंके तात्पर्य्यकों समझे बिना अज्ञताके कारणसे कुतकोंकाही प्रकाश किया है सो तो मेरा सब लेख पढ़नेसे निष्पक्षपाती सज्जन स्वयं विचार लेवेंगे ;-- . ____ और आगे फिर भी सातवें महाशयजीने पर्युषणा विचारके तीसरे पृष्ठकी आदिसे 9 वी पंक्ति तक लिखा है कि ( उत्तम रीतिसे उपदेश करते हुए यदि किसीको राग द्वेषकी प्रणति हो तो लेखक दोषका भागी नही है क्योंकि उत्तम रीतिसें दवा करने पर भी यदि रोगीके रोगकी शान्ति महो और सत्य हो जाय तो वैद्यके सिर हत्याका पाप नहीं है परिणाममें बन्ध, क्रियासे कर्म, उपयोग, धर्म, इस न्यायानुसार लेखकका आशय शुभ है तो फल शुभ है) • अपरके लेखकी समीक्षा करके पाठकवर्गको दिखाता हूं कि सज्जन पुरुषों सातवें महाशयजीकी बालजीवों निध्यात्वमें फंसाने वाली मायावृत्तिकी चातुराईका नमूना तो देखो-भाप अपने कदाग्रह पक्षपातसें नीजनशासनकी उमतिके काम्पों में विभकारक संपको नहरक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034484
Book TitleBruhat Paryushana Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagar
PublisherJain Sangh
Publication Year1922
Total Pages556
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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