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________________ सप्तमः ७] भाषाटीकासमेतम् । ( ३९ ) यदा कवीज्यौ भवतश्चतुर्थे नृपालबालोपि च भूमिपालः ॥ कुलीरगो देवगुरुः सचन्द्रो नृपालबालं प्रकरोति बालम् ॥ २८ ॥ !!! यदि जन्म में बृहस्पति शुक्र चतुर्थ भावमें हों तो राजपुत्र राजा होवे तथा कर्कका बृहस्पति चंद्रमासहित हो तो बालक राजाओं में श्रेष्ठ होवै ॥ २८ ॥ यदेन्द्रमन्त्री विधुजं प्रपश्येद्वणज्ञविज्ञं नृपतिं करोति ॥ प्रसूतिकाले यदि पंचराशौ चैकोऽपि बालं कुरते नृपालम् ॥ २९॥ यदि जन्मसमय बृहस्पति बुधको देखे तो गुणज्ञ तथा विद्यावान् राजा करता है तथा जन्मकाल में यदि पंचमभावमें एक भी बलवान् ग्रह हो तो बालक राजा होवे ॥ २९ ॥ 1 हितलवे तपनो विधुनेक्षितो नृपसुतं कुरुते च नृपोत्तमम् ॥ विधुसुतः सविधुः कुरुते नृपं भवति तुङ्गगतो यदि जन्मनि ॥ ३० ॥ सूर्य मित्रांशक में चन्द्रमासे दृष्ट हो तो राजपुत्र राजाओं में उत्तम होवे, बुध चन्द्रमासहित उच्च (६) का हो तो जन्महीसे राजा होवै ३० जनुषि लग्नगतो यदि लग्नपो बलयुतः किल // कण्टकगोऽपि वा ॥ अविरतं प्रकरोति तदा नृपं नृपजमेव न चित्रमिति स्फुटम् ॥ ३१ ॥ यदि जन्मसमय में लग्नेश लग्नमें बलवान् हो अथवा किसी अन्य केंद्रमें हो तो राजपुत्रको विना विलंब राजा करता है, इसमें कुछ आश्चर्य नहीं ॥ ३१ ॥ . रविरजे शनिना बलिना युतो भवति भूमिपति Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034482
Book TitleBhavkutuhalam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJivnath Shambhunath Maithil
PublisherGangavishnu Shreekrushnadas
Publication Year1931
Total Pages186
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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