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________________ (१४) ___ भावकुतूहलम्- अरिष्टध्यायःलग्ने ॥ विरतिं समुपैति बालकोऽयं खलखेटेरपि कामिनीतनुस्थैः ॥२॥ । (राशिचक्र ) लग्नकुण्डलीमें लगसे सप्तमपर्यंत चक्रपूर्वार्द्ध और अष्टमसे द्वादश पर्यंत उत्तराई है, चक्रके पूर्वार्द्धमें पापग्रह उत्तराईमें शुभग्रह हों और लग्नमें (कीटराशि४८) हों तो बालक मरजावै तथा पापग्रह स्त्रीसंज्ञक (सम ) राशियोंका लग्नमें हो तो भी वही फल जानना ॥२॥ । खलखगसहितो निशाकरोयं तनुमृतिमारगतो / हि जन्मकाले ॥ मृतिपदमुपयाति देवबालोऽपि च सकलैरविलोकितो न सौम्यैः ॥३॥ पापयुक्त चंद्रमा लग्न (१) मृति (८) मार(७) भाव में जन्मकालका हो उसे पापग्रह देखें, शुभग्रहोंकी दृष्टि उसपर न हो तो वह बालक मृत्युपदको प्राप्त होगा ॥३॥ अशुभावगोदयगतौ शुभदैरवलोकितो न खलु युक्तविधुः॥मृतिरत्यगे कृशविधौ कुगजागभगैः खलैरपि विकेन्द्रशुभैः ॥ ४॥ दो पापग्रह स्थिरराशि लग्नमें हो चंद्रमा शुभग्रहोंकी दृष्टि न हो और शुभग्रहोंसे युक्तभी न हो तो बालककी मृत्यु होवे और क्षीण चंद्रमा बारहवें लग्न अष्टमभावोंमें स्थिर राशियोंके पापग्रहोंके पापग्रह हो केद्रोंमें शुभग्रह न हों तो वही फल जानना ॥ ४॥ शीतांशावरिविरतिस्थिते विनाशः पापैःस्यात्सपदि युतेक्षितेपि जन्तोः॥ अष्टाब्दैःशुभखचरैश्च मिश्रखेटेर्वेदान्दैरपि मुनिभिनिरुक्तमेतत् ॥५॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034482
Book TitleBhavkutuhalam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJivnath Shambhunath Maithil
PublisherGangavishnu Shreekrushnadas
Publication Year1931
Total Pages186
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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