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________________ ( १४४ ) भावकुतूहलम् - [मारकादियोगाः रिपुभावपतौ लग्ने लग्नेशे रिपुभावगे ॥ मारकस्वामिना दृष्टे युते वा निर्द्धनो भवेत् ॥ २८॥ षष्ठेश लग्नमें और लग्नेश छठे भावमें हों इनपर मारकेशकी दृष्टि हो अथवा उससे युक्त हो तो मनुष्य निर्द्धन (धनरहित ) होवै ॥२८॥ चन्द्रादित्यौ यदा लग्ने वाङ्गपे निधनालये ॥ मारकेण युते दृष्टे नरो भवति निर्द्धनः ॥ २९ ॥ सूर्य, चंद्रमा लग्न में हों अथवा लग्नेश अष्टमभावमें हो और मार कसे युक्त वा दृष्ट हो तो मनुष्य निर्द्धन होंवे ॥ २९॥ ऋणीयोगः । पापयुतोऽ यदाङ्गनाथस्त्रिकभावनाथैर्युतेक्षितः थवा स्यात् ॥ पुत्रेश्वरेणापि युते विलग्ने शुभैरदृष्टे च भवेद्दणी सः ॥ ३० ॥ यदि लग्नेश त्रिक ६ । ८ । १२ भावोंके स्वामीसे युक्त वा दृष्ट हो अथवा पापयुक्त हो, शुभग्रह उसे न देखें तो पंचमेश से युक्त लग्नेश लग्नमें होनेसे जो धनवान् योग कहा है इसके हुये में भी वह मनुष्य ऋणी (कर्जदार ) होवै ॥ ३० ॥ अस्तारिनीचत्रिकभावगे वा लग्नेश्वरे मारकनाथयुक्ते ॥ भाग्याधिपेनाथ शुभैरदृष्टे भवेदृणीशो मनुजेश्वरोपि ॥ ३१ ॥ इति भावकुतूहले नानायोगनिरूपणाऽध्यायः ॥ १४ ॥ यदि लग्नेश अस्तंगत हो अथवा शत्रुराशिमें, नचिराशिमें, त्रिक ६।८। १२ भावोंमें हों मारकग्रहसे युक्त तथा उसे भाग्याधीश यद्वा शुभग्रह न देखें तो वह मनुष्य राजाभी हो तो भी ऋणियों में श्रेष्ठ होंवे ॥ ३१ ॥ इति भावकुतूहले माहीधरीभाषाटीकायां नानाविधयोगकथनाध्यायः ॥ १४ ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034482
Book TitleBhavkutuhalam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJivnath Shambhunath Maithil
PublisherGangavishnu Shreekrushnadas
Publication Year1931
Total Pages186
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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