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________________ ( १२६ ) भावकुतूहलम् । [ ग्रहावस्थाफलम् - भानोः सुते चेदुपवेशनस्थे करालका रातिजनानुतप्तः ॥ अपायशाली खलु दद्रुमाली नरोभिमानी नृपदण्डयुक्तः ॥ २ ॥ शनि उपवेशन में हो तो बडे प्रचंड शत्रुजनोंसे संतप्त ( दुःखी ) रहे सर्वथा धनादिका नाश करता है, तथा निश्चय है कि, उसके शरीर में ददु (दाद) बहुत होवैं और वह मनुष्य बडा अभिमानी ( घमंडखोर ) होवे तथा राजासे दंड बारंबार पावे ॥ २ ॥ नयनपाणिगते रविनन्दने परमया रमया परया युतः ॥ नृपतितो हिततो मतितोषकृद्बहुकलाकलितो विमलाक्तिकृत् ॥ ३ ॥ शनि नेत्रपाणि अवस्थामें हो तो उत्कृष्ट अन्यकी लक्ष्मीसे युक्त रहे, राजासे प्रेमपूर्वक प्रसन्नता पावै, अनेक कला ( विद्या वा तरकी) जाने, निर्मल वाणी बोले ॥ ३ ॥ नानागुणग्रामधनाधिशाली सदा नरो बुद्धिविनोदमाली || प्रकाशने भानुसुते सुभानुः कृपानुरक्तो हरपादभक्तः ॥ ४ ॥ जिस मनुष्यका शनि प्रकाशावस्थामें हो वह अनेक प्रकारके गुणोंके समूहको जाने, कुछ ग्राम (गांव) तथा धन उसके अधीनतामें रहें; सर्वदा सुबुद्धिके विनोदवाला होवे, सुन्दरकांति होवे, दयावान् एवं श्रीभगवान् शिवके चरणोंका भक्त रहे ॥ ४ ॥ महाधनी नन्दननंदितःस्यादपापकारी रिपुभूमिहारी ॥ गमे शनौ पंडितराजभावं धरापतेरायतने प्रयाति ॥५ ॥ शनि गमावस्था में हो तो महाधनी होवे पुत्रोंके हर्षसे हर्षित रहे पुण्य करनेवाला होवे शत्रुका नाश करे तथा उनकी भूमिहरण करे, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034482
Book TitleBhavkutuhalam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJivnath Shambhunath Maithil
PublisherGangavishnu Shreekrushnadas
Publication Year1931
Total Pages186
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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