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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (२९) त्वदुक्तरीत्या विधुशब्दवाच्यं राधाधवं मां न कथं ब्रवीषि ॥९॥ अर्थ-कलानिधि, गोकुलमें विराजमान, श्यामा (राधिका ) के प्रिय ऐसे तुमकोही मैं चंद्रमा मानती हूं-हे राधे ! तुम्हारी कही हुई रीतिसे चंद्रशब्दवाच्य राधापति मुजको (राधापति श्रीकृष्णचंद्र ) ऐसे क्यों न कहतीहो ॥ ९ ॥ भक्तिर्मया सा कतमा विधेया __ यया प्रसादो भवतो मुरारे॥ मम प्रसादाय विधेहि राधे __भक्तिं परामात्मनिवेदनाख्याम् ॥ १०॥ अर्थ--हे मुरारे ! जिससे आप प्रसन्न हो वह कौनसी भक्ति मैनें करनी चाहिये ? हे राधे ! मेरी प्रसन्नताके वास्ते आत्मा निवेदनाख्य ( अपने शरीरको मेरे अर्थ समर्पण करनेकी ) परम भक्ति करो ॥ १० ॥ विधि समुल्लङ्घय पराङ्गनासु प्रसङ्गमङ्गीकुरुषे कथं नु । विधेर्विधातुर्विधिलङ्घने मे का नाम भीतिर्भण भामिनीह ॥ ११ ॥ For Private and Personal Use Only
SR No.034245
Book TitleRambhashuk Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHariprasad Bhagirath
PublisherHariprasad Bhagirath
Publication Year1825
Total Pages31
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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